विभागीय जांच में यह भी सामने आया है कि जिस समय कथित दानपत्र निष्पादित हुआ, उस समय मदरसे के वैध प्रबंधक जहीन अहमद थे, जबकि दानपत्र में निहाल अहमद को प्रबंधक दर्शाते हुए उनके पक्ष में दान दिखाया गया है। सहायक रजिस्ट्रार फर्म्स, सोसायटी एवं चिट्स कार्यालय से प्राप्त अभिलेखों में यह विसंगति पाई गई है। नोटिस में चेतावनी दी गई है कि यदि निर्धारित अवधि सात दिन में संतोषजनक जवाब और मूल अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए गए, तो उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मदरसे की मान्यता के संबंध में नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
राजस्व अभिलेखों में नहीं मिला मदरसे का उल्लेख
नोटिस में कहा गया है कि फसली वर्ष 1408 से 1412 (1998-2004) तक के खसरा अभिलेखों में संबंधित भूमि पर किसी मदरसे अथवा शैक्षणिक संस्था के संचालन का उल्लेख नहीं मिला। विभाग का कहना है कि यदि उस समय भूमि पर मदरसा संचालित होता, तो उसका विवरण राजस्व अभिलेखों में दर्ज होना चाहिए था। इसके अलावा अलग-अलग अवसरों पर प्रस्तुत खसरा और खतौनी अभिलेखों में भी विरोधाभास पाए गए हैं।
बिना पंजीकरण और 10 रुपये के स्टांप पर दानपत्र पर सवाल
विभाग ने कथित दानपत्र की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं। नोटिस में कहा गया है कि अचल संपत्ति के दान के लिए पंजीकरण अनिवार्य होता है, जबकि प्रस्तुत दानपत्र अपंजीकृत बताया गया है। साथ ही इसे मात्र 10 रुपये के स्टांप पर निष्पादित दिखाया गया है, जो नियमों के विपरीत प्रतीत होता है। नोटरीकरण करने वाले अधिवक्ता के अधिकारों और पंजीकरण संबंधी विवरणों पर भी संदेह जताया गया है। वर्ष 2013 में संबंधित भूमि की जो रजिस्ट्री मदरसे के पक्ष में कराई गई, उसमें स्पष्ट उल्लेख है कि इससे पूर्व कोई अनुबंध या दान नहीं किया गया था। इससे वर्ष 1997 के कथित दानपत्र की सत्यता और अधिक संदेह के घेरे में आ गई है।
मदरसे के मान्यता संबंधी अभिलेख में जांच के दौरान गड़बड़ी पकड़ी गई थी। इस मामले में रजिस्ट्रार मदरसा शिक्षा परिषद की ओर से अंतिम नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। एक नोटिस सीधे इनको पहुंचा और दूसरा हमारी ओर से आज इन्हें भेजा गया है। अगर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिला तो आगे की कार्रवाई की जाएगी। -वर्षा अग्रवाल, जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी