आजमगढ़। सुख जो परिवार में है, वो कहीं और नहीं। घर में वट वृक्ष सरीखे बुजुर्गों का सानिध्य छोटों में संस्कारों के बीज बोता है। अनुशासन लाता है। बात संयुक्त परिवार की हो तो रिश्तों की डोरी से बंधा स्नेह और विश्वास का बंधन और भी खास हो जाता है। तब समझौता छोटा और खुशियां अपार हो जाती हैं। नगर पंचायत जहानागंज के मुस्तफाबाद गांव में एक ऐसा ही संयुक्त परिवार हैं, जो एक दूसरे की जरूरतों का ख्याल रखते हुए कई वर्षों से साथ हैं। आज एकल परिवार के चलन के बीच एकता के सूत्र में बंधा ये संयुक्त परिवार खास है।
नगर पंचायत जहानागंज के मुस्तफाबाद गांव के निवासी हरिलाल मिश्र उर्फ नान्हूं बाबा के परिवार में कुल 42 सदस्य हैं। सभी एक साथ एक छत के नीचे रहते हैं। यहां नियम है, जिसका कठोरता से पालन भी किया जाता है। पूरा परिवार दिन में एक बार साथ खाने पर जरूर बैठता है। सुनिश्चित किया जाता है कि सभी परिवार के सदस्य एक-दूसरे के हर पहलू को यहां साझा कर सकें। हरिलाल मिश्र ने बताया कि वह जब 17 वर्ष के थे तभी उनके पिता रामधनी मिश्र की मृत्यु हो गई। चार भाई और चार बहन थे। 25 वर्ष तक अपने गांव के प्रधान रहे हैं। साथ ही आज जिला सहकारी फेडरेशन में डायरेक्टर हैं। वहीं बहु माया मिश्रा जिला सहकारी बैंक में डायरेक्टर है। कहते हैं कि संयुक्त परिवार का फायदा सबसे अधिक है। किसी तरह की कोई चिंता नहीं होती है। दिनभर आपके आसपास आपके अपने रहते हैं। परिवार के सदस्यों से ज्यादा कौन किसकी मदद कर सकता है। सभी एक साथ रहते हैं। सभी एक-दूसरे की मदद करने के लिए आगे आते हैं। बच्चों को भी बाहरी दोस्तों की जरूरत नहीं होती है। एक साथ मिलकर पूरी टीम बना लेते हैं। खेल का रंग जमता है। बच्चे भी खुश रहते हैं। एकल परिवार में यह खुशियां कहां से मिलेंगी। संयुक्त परिवार का अपना महत्व है। इसे कायम रखना हम सभी की जिम्मेदारी हैं।
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एक साथ बनता है खाना
आजमगढ़। नान्हू बाबा ने बताया कि 42 लोगों का खाना एक साथ एक ही रसोई में बनता है, लेकिन कभी यह अहसास नहीं हुआ कि किसी को भोजन बनाने में परेशानी हो। घर की बड़ी महिलाओं के निर्देशन में छोटी बहुएं भोजन बनाती हैं। मंडी से सस्ती सब्जी लाने से लेकर अन्य सामानों के लाने की जिम्मेदारी एक सदस्य पर रहती है। वह अन्य सदस्यों के साथ समन्वय बनाकर सामान लाने का काम करता है।
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भोजन के लिए होती है वोटिंग
आजमगढ़। हरिलाल मिश्र उर्फ नान्हू बाबा का कहना है कि बड़े सदस्य छोटों की पसंद का खास ध्यान रखते हैं। जैसे कोई बच्चा पूड़ी-सब्जी बनाने की बात करता है तो कुछ दाल-चावल खाने की बात करते हैं। इसके बाद फिर वोटिंग होती है जिस पर ज्यादा वोट पड़ता है बस वही बन जाता है। हारने वाला भी खुश रहता है क्योंकि दूसरे दिन उसकी पसंद का ही भोजन बनता है। बस ऐसे ही छोटे-छोटे समझौते के साथ एकता की डोर बनी रहती है।00000000000000000000000
लॉकडाउन में किसी संजीवनी से कम नहीं संयुक्त परिवार
आजमगढ़। भारतीय संस्कृति और सभ्यता कितने ही परिवर्तनों के दौर से गुजरते हुए खुद को परिष्कृत कर ले, लेकिन परिवार आज भी मानवीय जीवन की स्वर्णिम संस्था है। खास करके संयुक्त परिवार आज जीवन का आधार बना हुआ है। सामाजिक, मनोरंजनात्मक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन करने में ऐसे परिवार को मानसिक तनाव, असुरक्षा, पारिवारिक कलह आदि की भावना छू तक नहीं पाई है। लॉकडाउन की स्थिति में ऐसे परिवार अपने सदस्यों के लिए संजीवनी से कम नहीं है। एक दूसरे की जरूरतों को सभी मिलकर पूरा कर लेते हैं।