मौसम विज्ञानियों ने इस बार अच्छी बारिश की संभावना जताई है। आमतौर पर जुलाई से बारिश शुरू हो जाती है लेकिन अभी तक शहर में मौजूद जर्जर पुराने भवनों को चिह्नित नहीं किया गया है। ना ही इस दिशा में पालिका प्रशासन कुछ काम शुरू कर सका है। कभी भी ढह जाने की स्थिति में पहुंच गए दो दर्जन से अधिक भवनों को निष्प्रयोज्य घोषित करने का काम नहीं किया जा सका है। ऐसे में अगर बरसात के मौसम में भवन गिरे तो बड़ी घटना से इनकार नहीं किया जा सकता। अगर हादसा होता है तो जवाबदेह कौन होगा? इसको लेकर नगर पालिका प्रशासन गंभीर नहीं है।
बरसात का मौसम जर्जर भवनों के लिए खतरनाक साबित होता है। लगातार रिमझिम बारिश की दशा में कच्चे पक्के जर्जर मकानों की दीवारों के गिरने की घटनाएं होती हैं। ऐसी घटनाओं में हर साल शहर और देहात क्षेत्रों में लोग घायल होते रहते हैं। नगर पालिका की ओर से शहर के जर्जर मकानों को चिह्नित कर उसे निष्प्रयोज्य घोषित कराने का काम किया जाता है लेकिन शहर में अभी तक ऐसा नहीं किया गया है। शहर के आसिफगंज, पहाड़पुर, बाजबहादुर, कोट, कटराकुंदीगढ़, मुकेरीगंज, फराश टोला, पुरानी सब्जी मंडी, सिविल लाइन और रैदोपुर में तमाम ऐसे पुराने जर्जर भवन हैं, जिनके बारजे टूटकर गिर चुके हैं। ऐसे कई भवनों के भूतल में दूकानें चलती हैं लेकिन किसी हादसे के भय से ऊपर वाली मंजिल के कमरों में कोई रहता नहीं है। बरसात के मौसम में ऐसे भवन अगर गिर गए तो बड़ा हादसा हो सकता है। बावजूद इसके इस गंभीर समस्या की तरफ नगर पालिका प्रशासन या प्रशासन का ध्यान नहीं है। नगर पालिका प्रशासन की बात मानें तो नगर क्षेत्र में कुल अठारह हजार एक सौ बत्तीस मकान हैं। इन मकानों में कितने मकान जर्जर हैं, आंकड़ा नगरपालिका प्रशासन के पास नहीं है। नगर पालिका ने अब तक नगर क्षेत्र में स्थित जर्जर मकानों को चिह्नित नहीं किया है।