आजमगढ़। जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव मंगलवार को किसी भी पक्ष के नहीं पहुंचने के कारण स्वतः रद हो गया। सुबह से ही नेहरू हॉल पर गहमागहमी रही, लेकिन दो बजे तक इंतजार करने के बाद पीठासीन अधिकारी अपर जिला जज तृतीय संजय कुमार वर्मा ने अविश्वास प्रस्ताव को खारिज कर दिया।
इससे जहां सपा खेमे में उत्साह का माहौल है वहीं, विरोधियों में निराशा रही। प्रदेश में भाजपा के सत्ता में आने के बाद समाजवादी पार्टी दो ब्लॉक प्रमुख की कुर्सी गंवा चुकी है। अब जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर निशाना था।
माना जा रहा था कि भाजपा के पूर्व सांसद के सहयोग से अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले पूर्व मंत्री दुर्गा यादव के भतीजे प्रमोद यादव कुर्सी पर कब्जा जमा लेंगे। पूर्व सांसद भी अंतिम समय तक प्रमोद के साथ खड़े थे।
मंगलवार को अविश्वास प्रस्ताव को लेकर सुबह से ही कलेक्ट्रेट क्षेत्र में काफी गहमागहमी थी। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के लिए दोपहर 12 बजे का समय दिया गया था। निर्धारित समय से पूर्व ही पीठासीन अधिकारी अपर जिला जज तृतीय संजय कुमार वर्मा, जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी एके सिंह, सहायक जिला निर्वाचन अधिकारी नगरीय और पंचस्थानीय राकेश सिंह नेहरू हॉल पहुंच गए।
दोपहर 12 बजे तक कोई भी जिला पंचायत सदस्य या अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले प्रमोद कुमार यादव नेहरू हॉल नहीं पहुंचे। पीठासीन अधिकारी ने निर्धारित समयावधि दो बजे तक इंतजार करने का निर्णय लिया। लेकिन जब दो बजे तक कोई नहीं पहुंचा तो पीठासीन अधिकारी अपर जिला जज तृतीय संजय कुमार वर्मा ने गणपूर्ति के अभाव में अविश्वास प्रस्ताव को स्वत: निरस्त होना घोषित कर दिया।
जिला पंचायत अध्यक्ष कुर्सी दूसरी बार प्रमोद के हाथ से छिटकी
आजमगढ़। पूर्व ब्लॉक प्रमुख और वर्तमान जिला पंचायत सदस्य प्रमोद कुमार यादव दूसरी बार जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पाने से वंचित रह गए। इस बार भी उन्होंने अपने साथ धोखा किए जाने का आरोप लगाया। इस धोखे से उनका राजनीतिक कैरियर एक बार फिर से हासिए पर आ गया है।
पल्हनी से ब्लॉक प्रमुख रहे प्रमोद यादव पूर्व वनमंत्री दुर्गा प्रसाद यादव के भतीजे हैैं। उन्होंने दुर्गा प्रसाद यादव से ही राजनीति का ककहरा सीखा। वर्ष 2016 में जब जिला पंचायत सदस्य पद के चुनाव में उन्होंने हाफिजपुर निर्वाचन क्षेत्र से जिला पंचायत सदस्य पद का चुनाव लड़ा।
सूत्रों की मानें तो जिले में सपा के एक दिग्गज ने उन्हें जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने का सपना दिखाया। चुनाव उन्होंने रिकार्ड मतों से जीता। उस समय सपा दिग्गज शिवपाल सिंह यादव ने जब जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए प्रत्याशियों की सूची जारी की तो उसमें प्रमोद कुमार यादव का नाम शामिल था, लेकिन बाद में इनका टिकट काटकर मीरा यादव को दे दिया गया।
सपा की सत्ता होने के कारण मीरा यादव का निर्विरोध निर्वाचन हो गया। लेकिन टिकट कटने के बाद प्रमोद कुमार यादव अपने चाचा दुर्गा प्रसाद यादव के विरोधी हो गए और चाचा को ही टिकट कटने का जिम्मेदार ठहराया।
इसके बाद अपने चाचा से अलग होकर वे अपना राजनीति ठौर तलाशने लगे। विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने अपने चाचा दुर्गा प्रसाद यादव के विरोध में बसपा प्रत्याशी भूपेंद्र सिंह मुन्ना का प्रचार भी किया। लेकिन चुुनाव दुर्गा प्रसाद यादव जीत गए।
इसके बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद दूसरा मौका पाकर सपा की जिला पंचायत अध्यक्ष मीरा यादव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाए। लेकिन इस प्रस्ताव में उनके पास जरूरी जिला पंचायत सदस्य नहीं हो सके। इस दूसरी हार ने प्रमोद के राजनीतिक कैरियर को हासिए पर ला दिया है साथ ही उनकी छवि को भी धक्का लगा है।
सुरक्षा के थे व्यापक इंतजाम
जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए मंगलवार केे होने वाले अविश्वास प्रस्ताव को लेकर प्रशासन काफी मुस्तैद नजर आया। नेहरू हाल का पूरा क्षेत्र पुलिस छावनी में तब्दील नजर आया। नेहरू हाल की ओर जाने वाले सभी मार्गों पर बैरिकेडिंग की गई थी। कई थानों की पुलिस को इन बैरिकेडिंग के पास तैनात किया था।
किसी भी वाहन को इस मार्ग से जाने की इजाजत नहीं थी। वहीं नेहरू हाल गेट पर मेटल डिटेक्टर लगाया गया था। हर आने जाने वाले की चेकिंग की जा रही थी। पंचायत कर्मियों को पास जारी किया गया था पास दिखाने के बाद ही किसी को अंदर जाने की इजाजत दी जा रही थी।
अब एक वर्ष तक मीरा की कुर्सी के लिए नहीं है खतरा
अपर मुख्य अधिकारी एके सिंह ने बता कि अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के लिए विपक्ष को 44 सदस्यों के साथ उपस्थित होना था। लेकिन निर्धारित समय तक वह अपने समर्थक सदस्यों के साथ अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के लिए नेहरू हॉल नहीं पहुंच सके जिसके कारण अविश्वास प्रस्ताव स्वत: ही निरस्त हो गया।
यह अविश्वास प्रस्ताव गिरने के साथ ही अब एक साल तक जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ कोई अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता है।