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Azamgarh News: प्रबंध समिति के खिलाफ दी तहरीर, मान्यता देने वाले अधिकारियों पर मेहरबानी

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मुबारकपुर के मदरसा जामिया नुरूल उलूम के प्रबंधक जहीन खान ने फर्जी दानपत्र के सहारे मदरसे की मान्यता ली और उसे एडेड भी कराया। जिले के जिम्मेदार अधिकारियों ने न तो मान्यता के लिए प्रस्तुत अभिलेखों की जांच की और न ही उसकी जरूरत समझी।
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जांच में पुष्टि के बाद अब विभाग इस कार्य को करने वाले अधिकारियों को बचाने में जुटा है। बता दें कि मदरसा जामिया नुरूल उलूम की मान्यता लेने से पहले प्रबंधक जहीन अहमद ने अंजुमन सिद्दीकिया नामक समिति का 17 जनवरी 1998 को पंजीकरण कराया था।
इसके बाद 1998 में आलिया स्तर की स्थायी मान्यता फर्जी दानपत्र के आधार पर प्राप्त की थी। यह दानपत्र 20 जून 1997 का बताया गया था।
इस दानपत्र में भूमि तहसील मोहम्मदाबाद गोहना, जनपद आजमगढ़ में अंकित थी। हालांकि, वर्ष 1988 में ही मऊ जनपद का गठन हो चुका था। मोहम्मदाबाद गोहना तब मऊ जिले का हिस्सा था, जिससे दानपत्र संदिग्ध हो गया। प
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रिषद ने प्रबंधन को अपना पक्ष रखने के कई अवसर दिए, लेकिन उपलब्ध कराए गए जवाब संतोषजनक नहीं पाए गए। जांच में और भी कई गंभीर विसंगतियां सामने आईं। वर्ष 1997 के दानपत्र में आजमगढ़ का उल्लेख था, जबकि मोहम्मदाबाद गोहना मऊ जिले में था।
फसली वर्ष 1998 से 2004 तक के खसरा अभिलेखों में संबंधित भूमि पर मदरसे का कोई उल्लेख नहीं मिला। दानपत्र में प्रबंधक निहाल अहमद को दर्शाया गया, जबकि उस समय वैध प्रबंधक जहीन अहमद थे।
जांच में इस बात की पुष्टि होने पर रजिस्ट्रार मदरसा शिक्षा परिषद अंजना सिरोही ने जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी को प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्देश दिया। जब उन्होंने मार्गदर्शन मांगा तो रजिस्ट्रार ने प्रबंध समिति के खिलाफ प्राथमिकी का निर्देश दिया।
रजिस्ट्रार ने उन अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी का निर्देश नहीं दिया जिन्होंने मदरसे को मान्यता दिलाने में महती भूमिका अदा की थी। जबकि प्रबंधन के साथ ही अधिकारी भी जिम्मेदार थे।
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1998 के दौरान उप्र और हिंदी भाषी राज्यों में मदरसों को मान्यता के नियम
वैधानिक संस्था के रूप में पंजीकरण
मदरसे के पास पक्का या उपयुक्त भवन होना जरूरी था, जिसमें छात्रों के बैठने के लिए पर्याप्त कक्षाएं और एक प्रशासनिक कार्यालय हो।
भूमि या भवन या तो संस्था के स्वामित्व में हो या फिर लंबे समय के लिए वैध लीज (किराएनामे) पर होना आवश्यक था।
पारंपरिक अरबी, उर्दू और फारसी भाषाओं की शिक्षा के साथ-साथ ''मान्यता समिति'' द्वारा तय धार्मिक (दीनियात) और बुनियादी आधुनिक विषयों की पढ़ाई का नियम था। उच्च स्तर की कक्षाओं जैसे मौलवी (10वीं समकक्ष), आलिम (12वीं समकक्ष), कामिल और फाजिल के लिए अलग-अलग मानक तय थे।
मदरसे के सुचारू संचालन और शिक्षकों के वेतन भुगतान के आश्वासन के लिए प्रबंधन समिति को एक सुरक्षित कोष या बंदोबस्ती राशि बैंक या पोस्ट ऑफिस में दिखानी होती थी। सरकारी अनुदान न मिलने की स्थिति में मदरसा अपने आंतरिक स्रोतों (चंदा/जकात) से खर्च चलाने में सक्षम होना चाहिए था।
मदरसों की मान्यता की जांच रजिस्ट्रार/निरीक्षक, अरबी और फारसी परीक्षाएं (उत्तर प्रदेश) और सरकार द्वारा गठित ''मान्यता समिति'' के माध्यम से की जाती थी।
भौतिक निरीक्षण की रिपोर्ट के आधार पर ही अंतिम मंजूरी दी जाती थी।
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यह जो प्राथमिकी दर्ज करने का मामला है, इसमें जिला अल्पसंख्यक अधिकारी ने रजिस्ट्रार से मार्गदर्शन मांगा था। ऊपर से ही प्रबंध समिति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्देश हुआ था। इसके क्रम में यह तहरीर दी गई है। आगे जैसा निर्देश होगा, उसका पालन किया जाएगा। -विजय प्रताप यादव, उप निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण विभाग।
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