बूढनपुर। जंगली पशुओं, छुट्टा पशुओं द्वारा किसानों की फसल को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। जिसके कारण क्षेत्रीय किसानों को काफी नुकसान पहुंच रहा है। किसानों की हो रही दुर्दशा को देखते हुए भी सरकार अनदेखी कर रही है। छुट्टा पशुओं के रखरखाव का कोई इंतजाम नहीं कर रही है।
बता दें कि पशुपालकों द्वारा गाय के बछड़े को छोड़ देने के कारण यही बछड़े किसानों के अरमांनों पर पानी फेरने का काम कर रहे हैं। किसान बड़ी ही मुश्किल से इस बार धान की फसल लगाया है। जिसे सैकड़ों की संख्या में बछड़े जाकर के फ़सलों को खाते हैं और रौंद देते हैं। इसके अलावा नीलगाय, जंगली सूअर पहले से ही किसानों को तबाह कर रहे हैं। अब तो यह जंगली बछड़े और साड़ भी फ सलों को तो खाने के साथ खेत से हटाने पर किसानों को दौड़ा करके मारते है। बछड़ तो अभी कम उम्र के हैं, जब बड़े हो जाएंगे तो और भी परेशान करेंगे। इन छुट्टा पशुओं के रखरखाव के लिए सरकार द्वारा कोई प्रबंध नहीं किया जा रहा है। मात्र गौकशी पर रोक लगाने से ही देश समृद्धशाली नहीं हो जाएगा। उसके लिए किसान का समृद्धिशाली होना अत्यंत आवश्यक है। अन्नदाता कहा जाने वाला किसान बेबसी लाचारी की जिंदगी जी रहा है। सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों का सीधी मार किसान को पड़ रही है। क्षेत्र के किसान लालजी पांडे ने कहा कि गाय के चारे के लिए बाजरा की बुआई की गई थी। जिसे जंगली सांड़ खा गए और रौंद रहे हैं। बजरंगी प्रधान का कहना है कि अगर सरकार गौकशी पर रोक लगाई है तो इन जंगली सांडों को रहने का भी बंदोबस्त करना चाहिए। गौशालाओं की जमीन को घेराबंदी करके उसी में सारे जंगली सांडों को छोडना चाहिए, ताकि किसानों की फसलें बच सके। पारस वर्मा का कहना है कि कह देने मात्र से काम नहीं चलता हम किसानों का दुख दर्द अगर सरकार समझती तो ऐसा नहीं करती। हम किसानों के दुख दर्द से सरकार को क्या मतलब। शोभा वर्मा का कहना है कि सरकार केवल किसानों को ही परेशान करती हैं। किसान की दुर्दशा को किसी को पता नहीं है एक तो मौसम की मार दूसरे महंगाई की मार तीसरी जंगली पशुओं की यह तीनों मार किसान को ही झेलनी पड़ती है।