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पुस्तकालय के रजत जयंती समारोह में हुआ पुस्तक का विमोचन

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सगड़ी तहसील के जोकहरा स्थित श्री रामानंद सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने पर रविवार को पुस्कालय सभागार में रजत जयंती समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें कुलभूषण मौर्य द्वारा लिखित भारतीय स्वाधीनता आंदोलन और अमरकांत पुस्तक का विमोचन किया गया।
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सभागार में अमरकांत की रचना और विचार विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। जिसकी अध्यक्षता प्रियदर्शन मालवीय और संचालन डा. संजय श्रीवास्तव ने किया। मुख्य अतिथि प्रो. चितरंजन मिश्र अध्यक्ष हिंदी विभाग विश्वविद्यालय गोरखपुर और संयोजक हिंदी भाषा साहित्य अकादमी नई दिल्ली ने कहा कि अमरकांत प्रेमचंद के बाद के एक ऐसे अद्भुत कथा शिल्पी हैं। जिनके यहां भारतीय नियम मध्यवर्गीय जीवन की विनम्र बिडंबना चुपचाप व्यक्त होती है। उसमें व्यथा का हाहाकार तो है लेकिन उनके पात्रों में अपराजेय जिज्ञासा भी है। वे पात्र सिर्फ जीवन के लिए संघर्ष करते हैं। उनकी गरीबी इतनी भयावह है जो भारतीय समाज की ही है। उनके पात्र जीने के लिए ही संघर्ष करते हैं और उनका जीवन ही संघर्ष की एक व्यापक व्याख्या करता है। दोपहर का भोजन, डिप्टी कलक्टरी जैसी कहानियां एकरस जीवन की जो अवसाद पूर्ण स्थितियां हैं। उनका मार्मिक दस्तावेज बनती हैं। इसके लिए उन्होंने जो सहज और सादा शिल्प चुना है वह उनका अपना निजी है । उनके ऊपर किसी आंदोलन का कोई आतंक नहीं है और वे सहज कथाकार हैं। बीज वक्तव्य में डा. अनिल राय विश्वविद्यालय गोरखपुर ने कहा कि अमरकांत अपनी साहित्य दृष्टि और जीवन दृष्टि में प्रगतिशील यथार्थवादी लेखक हैं। उन्होंने एक अस्पष्ट पारदर्शी भाषा और शिल्प में स्वातंत्र्योत्तर भारत के मध्य वर्गीय, निम्न मध्यवर्गीय जनजीवन के सामाजिक संदर्भों को उनसे जुड़े हुए प्रश्नों को अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से लगातार उद्घाटित करने का प्रयत्न किया है। वह अपनी रचनाओं के माध्यम से मनुष्य के जीवन की त्रासदी के लिए कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष और सूक्ष्म स्तर पर अपने समय की व्यवस्था को प्रश्नांकित करने की कोशिश करते देखे जाते हैं।सामान्य जन के साथ उनकी प्रतिबद्धता उन्हें एक महत्वपूर्ण लेखक के रूप में प्रतिष्ठित करती है। डा. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि अमरकांत जी को याद करना अपने समय के सबसे विशिष्ट कथाकार को याद करना है। वह प्रेमचंद की परंपरा के वाहक थे। रीवा विश्वविद्यालय मध्यप्रदेश के प्रो. दिनेश कुशवाहा ने कहा कि अमरकांत ने जब लिखना शुरू किया तो भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो चुका था। आजादी ने देश को आत्म गौरव और संप्रभुता दी लेकिन उसकी कुछ कहानियां थी।जिसके चलते देश का मजदूर किसान मध्य और निम्न वर्ग एक तरह से छला और वंचित महसूस कर रहा था। डा. नलिनी रंजन सिंह ने कहा कि रचना और विचार पर अध्ययन करने के लिए और उसकी वैचारिकी को जानने के लिए उसके परिवेश और पृष्ठभूमि जानने की जरूरत है। विभूति नारायण राय ने कहा कि पूरा इलाका सन्नाटा सा रहता था। धीरे-धीरे भवन बना। पिछले 25 वर्षों में एक लंबे समय में यहां तक पहुंचा गया। लोगों में किताबें पढने की आदत डालना था। हिंदी का कोई बड़ा नाम नहीं है, जो यहां ना आया हो। अंत में हीना देशाई निदेशक रामानंद पुस्तकालय जोकहरा ने सभी का आभार व्यक्त किया। इस मौके पर अखिलेश, प्रियदर्शी, मालवीय, अरविंद कुमार सिंह, रमाकांत राय, आदित्य गिरी आदि उपस्थित थे।
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- अंबुज राय
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