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इंजीनियरिंग कालेज द्वारा तैयार एंजाइम का सफल रहा प्रयोग

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आजमगढ़। नालों के गंदे पानी की सफाई के लिए राजकीय इंजीनियरिंग कालेज द्वारा तैयार किए गए एंजाइम की टेस्टिंग का कार्य पूरा हो गया। इसके सफल होने पर डीएम ने राजकीय इंजीनियरिंग कालेज में ही दो सौ लीटर एंजाइम तैयार करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही डीएम ने नगरपालिका ईओ को उन्हें जरूरी सामान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
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नगर क्षेत्र से लगभग 22 छोटे बड़े नालों के माध्यम से शहर का गंदा पानी नगरपालिका द्वारा तमसा में बहाया जाता है। इसके कारण नदी का जल प्रदूषित हो रहा है। इस पानी को स्वच्छ करने के लिए डीएम शिवाकांत द्विवेदी ने नोएडा की एक संस्था से संपर्क किया। ये संस्था एंजाइम से पानी को साफ करती है। यह एंजाइम कंपनी 300 रुपये लीटर की दर से देती है जो काफी महंगा होता है। इसे देखते हुए ही डीएम ने देवगांव स्थित राजकीय इंजीनियरिंग कालेज को इसे बनाने की जिम्मेदारी सौंपी। एंजाइम के तैयार होने के बाद जब इसका परीक्षण किया गया तो यह सफल रहा। शनिवार को इंजीनियरिंग कालेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. अनूप नारायण सिंह के नेतृत्व में स्तुति मौर्या और आसिफ अंसारी की टीम डीएम से मिली। डीएम ने इसके बारे में जानकारी लेने के बाद टीम को दो सौ लीटर एंजाइम तैयार करने का निर्देश दिया। साथ ही नगरपालिका के ईओ वीरेंद्र श्रीवास्तव को एंजाइम में प्रयुक्त होने वाले सामानों केे उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
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एसडीएम करेंगे दो व्यक्तियों की व्यवस्था
टीम के सदस्यों के अनुसार एंजाइम बनाने के दौरान उसकी सतत निगरानी करनी होती है। इसके लिए डीएम ने एसडीएम से कहकर गांव के प्रधान के जरिए दो लोगों की व्यवस्था कर कालेज भेजने को कहा है। ये विशेषज्ञों की देखरेख में एंजाइम बनाने में मदद करेंगे।
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फल के छिलके, गुड़ व पानी से बनता है एंजाइम
डा. अनूप नारायण सिंह ने बताया कि एंजाइम बनाने में फलों के छिलके, गुड़ और पानी की जरूरत होती है। इसे बनने में कम से कम तीन महीने का समय लगता है। इसे बनाना महंगा नहीं है लेकिन समय काफी लगता है। एक लीटर एंजाइम तैयार होने के बाद उसे 100 लीटर पानी में मिलाकर काफी मात्रा में एंजाइम तैयार किया जा सकता है। जिस बर्तन में एंजाइम तैयार हो वह चूड़ीदार ढक्कन से बंद होना चाहिए। साथ ही उसे धूप से भी बचाना है।
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नोएडा की कंपनी जो एंजाइम हमें उपलब्ध कराती है वह काफी महंगा पड़ता है। इसलिए इसे स्थानीय स्तर पर ही बनाने का निर्णय लिया गया है। धीरे-धीरे इसे स्वयं सेवी संगठनों के माध्यम से तैयार कर इसकी बिक्री भी कराई जाएगी ताकि हर घर में इसका प्रयोग हो और नालों पर हमें इसे लगाने की जरूरत न पड़े।
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शिवाकांत द्विवेदी, डीएम।
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