कभी दंगल, कबड्डी व आल्हा-कजरी से गुलजार रहते थे गांव, अब सूने पड़े अखाड़े और मैदान
रेहान खान
भेलसर। नाग पंचमी कभी गांवों में केवल नाग देवता की पूजा नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव का अवसर होती थी। सुबह अखाड़ों में दंगल, दिन में कबड्डी और शाम को आल्हा-कजरी की महफिलें सजती थीं। सावन के झूलों पर लोकगीत गूंजते थे। समय के साथ सोशल मीडिया और डिजिटल मनोरंजन ने नई पीढ़ी को मैदान व चौपाल से दूर कर दिया। रुदौली के हलीमनगर में नाग पंचमी के दूसरे दिन लगने वाला ‘हापा’ मेला आज भी पुरानी परंपरा की झलक दिखाता है। ग्रामीण मातादीन और शोभालाल यादव बताते हैं कि पहले सुबह से उत्सव रहता था। अखाड़ों में पहलवानों के दांव-पेच देखने भीड़ जुटती और कबड्डी में युवाओं का दमखम देखने लोग मैदान घेर लेते थे। शाम को आल्हा और देर रात तक कजरी की महफिलें चलती थीं।
आल्हा-कजरी के कलाकार और श्रोता दोनों कम
आल्हा की वीरगाथाएं कभी गांवों में जोश भरती थीं। कजरी की सामूहिक गायकी भी सावन की पहचान हुआ करती थी। अब इन आयोजनों के कलाकार और श्रोता दोनों कम हो गए हैं। बुजुर्ग पीढ़ी इन परंपराओं को याद करती है, लेकिन नई पीढ़ी में इन्हें सीखने और आगे बढ़ाने की रुचि घट रही है।