रामनगरी अयोध्या में सावन झूलनोत्सव की विशिष्ट परंपरा है। यहां मंदिरों में अलग-अलग परंपरा के तहत झूलनोत्सव का आयोजन होता है। इसी क्रम में राम मंदिर से सटे रंग महल मंदिर में पूरे एक माह तक झूलनोत्सव की अनुपम छटा बिखरती है। यूं तो नगरी में झूलनोत्सव का शुभारंभ सावन शुक्ल त्रयोदशी यानी 15 अगस्त को होगा, पर रंगमहल जैसी मधुर उपासना परंपरा की प्रमुख पीठ में सावन माह की पूर्व संध्या यानी गुरुपूर्णिमा की शाम के साथ ही झूलनोत्सव की छटा बिखरने लगेगी और पूरे एक माह यानी सावन पूर्णिमा तक यहां झूलनोत्सव की बहार रहेगी।
रंगमहल के महंत रामशरण दास के अनुसार इस परंपरा के मूल में मंदिर के संस्थापक आचार्य एवं 200 वर्ष पूर्व हुए महान रसिक संत सरयूशरण की उद्भावना है। उनके लिए भगवान पाषाण या धातु के विग्रह न होकर चिन्मय-चैतन्य सत्ता थे और वे भगवान की सेवा- सत्कार का कोई मौका नहीं जाने देते थे।
इसी क्रम में सावन लगा नहीं कि पूर्व संध्या से ही रंगमहल में भगवान राम और भगवती सीता के साथ भरत-मांडवी, लक्ष्मण-उर्मिला एवं शत्रुघ्न-श्रुतिकीर्ति के विग्रह झूले पर विराजमान हो जाते थे। यह परंपरा सैकड़ों वर्ष बाद आज भी जीवंत है।
झूलनोत्सव की भव्यता का आलम भगवान एवं उनके भाइयों के चार झूले सहित झूलनोत्सव के दरबार में प्रस्तुत संगीत संध्या से अभिव्यक्त होता है। महंत रामशरण दास बताते हैं कि झूलनोत्सव के क्रम में ही सावन शुक्ल एकादशी पर प्रसिद्ध ''गलबहियां'' की झांकी सजती है, जिसमें श्रीराम और सीता एक-दूसरे के गले में बांह डाले दर्शन देते हैं। इसके लिए सावन कृष्ण एकादशी पर फूलबंगला झांकी का आयोजन होगा। संगीत, गायन-वादन और फूलों के बंगले (फूल-बंगला) की अलौकिक सजावट मुख्य आकर्षण होती है।