अयोध्या। तमाम प्रयासों के बावजूद जिले की हर दूसरी महिला और किशोरी के शरीर में खून की कमी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़े इसकी पुष्टि कर रहे हैं। हालांकि, बच्चों और गर्भवती महिलाओं में स्थिति पहले से बेहतर हुई है। एनीमिया केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि कुपोषण और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का संकेतक माना जाता है। इसका असर महिलाओं की कार्यक्षमता, गर्भावस्था और बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के अनुसार पिछले सर्वेक्षण की तुलना में जिले में एनीमिया के मामलों में कमी दर्ज की गई है, लेकिन समस्या का दायरा अभी भी बड़ा है। एनएफएचएस-5 के अनुसार छह माह से पांच वर्ष तक के बच्चों में एनीमिया की दर 71.6 फीसदी से घटकर 57.7 फीसदी हो गई है। गर्भवती महिलाओं में यह दर 49.3 से घटकर 39.3 रह गई है। वहीं 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में एनीमिया 55.7 से घटकर 50.3 और किशोरियों में 58.9 से घटकर 52.7 रह गया है।
एनीमिया की अधिकता चिंता का विषय
महिला अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ और फॉग्सी की सचिव डॉ. निशी सिंह ने बताया कि महिलाओं और किशोरियों में एनीमिया की अधिकता भविष्य में मातृ और शिशु स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है। किशोरावस्था में खून की कमी आगे चलकर गर्भावस्था के दौरान जटिलताओं का कारण बन सकती है। उन्होंने बताया कि भोजन में आयरन की कमी, हरी सब्जियों और पौष्टिक आहार का कम सेवन, गर्भावस्था के दौरान खानपान पर ध्यान न देना, समय पर जांच और इलाज न होने आदि कई कारणों से महिलाएं एनीमिया की चपेट में आ रही हैं। इससे बचाव के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां, दाल, चना, गुड़ और मौसमी फल खाएं, आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां नियमित लें, हीमोग्लोबिन की समय-समय पर जांच कराते रहना चाहिए।
कोट्स
एनीमिया मुक्त भारत अभियान के तहत स्क्रीनिंग, उपचार और जागरूकता कार्यक्रम लगातार चलाए जा रहे हैं। पिछले वर्षों की तुलना में जिले में सुधार हुआ है, लेकिन महिलाओं और किशोरियों में एनीमिया की दर को और कम करने के लिए विशेष रणनीति के तहत काम किया जा रहा है।
डॉ. देवेंद्र कुमार भिटौरिया, सीएमओ