फोटो-17-झेंसी की हल्दी मेंहदी की रस्म में मौजूद महिलाएं। स्रोत:आयोजक
अछल्दा। ब्लॉक के नगरिया गांव में दशहरे के बाद टेसू-झेंझी विवाह की पुरानी परंपरा आज भी उल्लास के साथ मनाई जा रही है। शुक्रवार की रात गांव में झेंझी की हल्दी और मेहंदी की रस्म धूमधाम से संपन्न हुई। इस दौरान लोकगीतों और बुंदेली गानों पर महिलाओं ने जमकर नृत्य किया।
गांव निवासी भूपेंद्र सिंह के पुत्र अंकित उर्फ गोलू के घर झेंझी की हल्दी और मेहंदी की रस्म रखी गई। घर के आंगन से लेकर गली तक लोकगीतों की मधुर गूंज सुनाई दी। गांव की महिलाओं और युवतियों ने दुल्हन की तरह सजी झेंझी को हल्दी लगाई। उन्होंने झेंझी के हाथों पर मेहंदी भी रचाई। इसके बाद सभी ने मंगल गीत गाते हुए झेंझी को आशीर्वाद दिया।
रात बढ़ने के साथ ही पूरे माहौल में मस्ती और उत्साह घुल गया। तेज संगीत पर बुंदेली गाने बजने लगे तो महिलाएं खुद को रोक नहीं पाईं। उन्होंने जमकर नृत्य किया और खुशियां मनाईं। इस आयोजन में झेंझी नचाने की परंपरा सबसे आकर्षण का केंद्र रही। जब झेंझी को नचाया गया तो देखने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी।
बुजुर्गों ने इस परंपरा के गहरे महत्व को बताया। उन्होंने कहा कि यह केवल एक खेल नहीं है। यह अटूट प्रेम, फसल की खुशहाली और गांव की एकता का प्रतीक है। गांव के लोग हर साल इसी तरह टेशू-झेंझी का ब्याह रचाते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को अपनी पुरानी संस्कृति और जड़ों से जोड़े रखना है।
परिजनों ने जानकारी दी कि हल्दी रस्म के बाद पूर्णिमा के दिन टेसू झेंझी का विवाह होगा। यह विवाह भी बड़ी धूमधाम और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाएगा। ग्रामीणों ने आधुनिकता की चकाचौंध के बावजूद अपनी इस सांस्कृतिक विरासत को सहेज कर रखा है। यह परंपरा ग्रामीण जीवन का अभिन्न अंग है। मान्यता है कि टेसू झेंझी के ब्याह के बाद ही सहालग का दौर शुरू हो जाता है।