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Auraiya News: दीपावली पर परंपराएं जीवित, मनाने का तरीकों में आई आधुनिकता

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औरैया। दीपावली पर्व पर परंपराएं भले ही जीवंत हों, लेकिन इस मनाने के तौर तरीके पर आधुनिकता की छाप जरूर दिखाई देने लगी है। लोग बाजारों में मिलने वाले सामानों पर निर्भर होने लगे हैं।
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हर्षोल्लास के इस त्योहार पर सभी अपने दूर-दराज से आकर रिश्तों में प्रेम और सौहार्द का दीप जलाते हैं। लेकिन यह दीप सरसों के तेल से नही, बिजली से रोशन होते हैं। मिट्टी के दीये भी भीनी सुगंध देते थे लेकिन अब यह भी गुजरे जमाने की बात हो गई। कंडील की जगह अब झूमर ने ले ली है। बुजुर्गों की मानें तो पहले पर्वों को लेकर अलग ही उल्लास देखने को मिलता था। अब लोगों के पास समय का अभाव है। चंद घंटों में ही पर्व मनाए जा रहे हैं। पहले पर्व को लेकर तैयारियां कई दिनों पहले शुरू कर दी जाती थीं। लेकिन अब ऐसा नहीं हैं। बाजारों में कुछ सामान लाकर अब पर्व को मनाने की खानापूर्ति की जाती है।


फाेटो31एयूआरपी 15- केके गुप्ता

पहले की कंडील की जगह अब झूमर ने ली

हम खुद ही सामग्री एकत्रित करके कंडील बनाते थए। मुख्य द्वार और छतों पर सबसे ऊंचा कंडील लगाने की बहस होती थी। इसमें मिट्टी के तेल से भरा बड़ा दीया रखते थे। दीये की रोशनी से पूरा घर आंगन जगमग होता था। उस समय पटाखे कैमिकल युक्त नहीं थे। मिट्टी के दीये की सुगंध से पर्यावरण को फायदा होता था। दीये और पटाखे के जलने से कीड़े-मकोड़े भी मर जाते थे। जिसमें इतनी बीमारियां नहीं फैलती थीं। कंडील, मिट्टी के दीये गायब हो रहे हैं। - केके गुप्ता, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य
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फाेटो31एयूआरपी 16- श्री भगवान पोरवाल

पटाखे व लाइट तक सिमट रही दीपावली

एक माह पहले ही परिवार के सभी सदस्य घरों की रंगाई-पुताई व सजावट में लग जाते थे। अब अधिकांश घरों में यह काम दूसरे ही करते हैं। लोगों को बिजली की रंग-बिरंगी लाइटों और पटाखों पर कम मिट्टी के दीयों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। बिजली की लाइटों से पर्यावरण को कई फायदा नहीं मिलता है। मिट्टी के दीये में सरसों का तेल डालकर जलाने से पर्यावरण को काफी लाभ मिलता है। त्योहारों से अपनी संस्कृति और रिश्तों की याद ताजा होती है। श्री भगवान पोरवाल, व्यापारी


फाेटो31एयूआरपी 17- रेखा पोरवाल

पर्व में एक साथ होने पर आपस में बढ़ता है प्रेम

दीपावली पर्व परिवार में एकता और सामंजस्य का अनुभव कराता है। इससे रिश्तों में प्रेम और अपनापन बढ़ता है। दीपावली पर पूजा की तैयारियों में बुजुर्गों का मार्गदर्शन हमें परिवार में एकता और सामंजस्य का अनुभव कराती हैं।
- रेखा पोरवाल, समाजसेवी


फाेटो31एयूआरपी 18- प्रीती पोरवाल

तरीका बदला, रिवाज वही पुराने

आज पर्व को मनाने का तरीका भले ही बदल गया है। लेकिन रीति-रिवाज आज भी पहले की तरह ही हैं। पहले मिट्टी के दीयों से घर रोशन होते थे। आज झालरों और पानी से जलने वाले दीयों का प्रयोग होने लगा है।
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- प्रीती पोरवाल, समाजसेवी
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