औरैया। सरकारी विभागों में अनुबंध पर लगाए जाने वाले वाहनों की टेंडर प्रक्रिया नियमानुसार ही कराई जाती है। बाकायदा यह शर्त रखी जाती है कि वाहन का टैक्सी परमिट होना चाहिए। लेकिन बाद में लिपिकों की ओर से इसमें गोलमाल कर दिया जाता है। अफसर सब जानकर भी चुप्पी साधे रहते हैं।
जिले के अधिकांश विभागों में सरकारी वाहन नहीं है। ऐसे में अधिकारी अनुबंध पर वाहन रखते हैं। इसके लिए विभाग की ओर से टेंडर जारी किया जाता है। इनकी शर्तों में गाड़ी का मॉडल, कितने साल पुराने, मय चालक या बिना चालक और वाहन का टैक्सी परमिट आदि शामिल हैं। टेंडर डालने वाले भी यह घोषणा करते हैं कि वह टैक्सी परमिट वाहन देंगे। टेंडर पास होने के बाद वाहन का अनुबंध करने के दौरान बाबू टेंडर की शर्तों को किनारे कर निजी वाहन का अनुबंध कर देते हैं। इसके लिए वह अपना हिस्सा तय कर लेते हैं। अधिकारियों को भी इसकी जानकारी होती है क्योंकि वह रोजाना उसी वाहन में चलते हैं। बावजूद वह भी वह आंखें मूंदे रहते हैं। करीब 10 से अधिक विभागों में यह खेल चल रहा है।
वैसे तो परिवहन विभाग सड़क पर बिना टैक्सी परमिट के सवारी ढोने वाले वाहनों पर कार्रवाई करता नजर आता है। जब बात अपनों की आती है तो उनके भी हाथ बंध जाते हैं। बीते छह माह में ऐसे किसी वाहन पर कार्रवाई नहीं हुई जो अनुबंधित तो है पर टैक्सी परमिट नहीं है। मामला उजागर होने के बाद अब अधिकारी जल्द कार्रवाई की बात कह रहे हैं।