शरद ऋतु को बाय - बाय करने को ऋतुराज वसंत का आगमन हो गया है। वसंती रंग में दुल्हन की तरह धरती सजी है। आज हम वसंत पंचमी के साथ मां सरस्वती की पूजा-अर्चना कर रहे हैं।
श्रृंगार से सजी फसलें और पेड़ाें पर आए नए पत्तों के साथ प्रकृति भी पूर्ण यौवन पर है। वहीं आध्यात्मिक, प्राकृतिक व चिकित्सकीय दृष्टिकोण से वसंत का काफी महत्व है।
वेद पुराणों में ऋतुराज वसंत को सदियों से सभी ऋतुओं में श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन नक्षत्रों में परिवर्तन का योग बनता है। मां सरस्वती का जन्म दिवस भी इसी दिन मनाया जाता है। ज्योतिषाचार्य इस दिन को छात्र-छात्राओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दिन बताते हैं।
कहते हैें कि इस दिन छात्र-छात्राओं को दूध में काले तिल डालकर मां सरस्वती को अर्पित करने से उनकी बुद्धि का विकास होगा। साथ ही छात्राएं पान के पत्ते पर रोली, हल्दी, बतासे से ज्ञान देवी की आराधना करें तो उनमें शिक्षा के प्रति और लगन बढ़ेगी।
अध्यात्मिक महत्व--वेदाचार्य पं. प्रमोद द्विवेदी बताते हैं कि इस दिन शिक्षण संस्थाओं में वसंती फूल, गेहूं पौध के साथ धन-धान्य से मां सरस्वती के पूजा अर्चना करने से शिक्षा के क्षेत्र में भी तरक्की होती है।
प्राकृतिक महत्व--शरद ऋतु के विश्राम के बाद वसंत ऋतु में प्रकृति अपने नए कलेवर में सज जाती है। वृक्षों से पुराने पत्ते झड़ने के बाद उनमें नई कोपलें फूटने लगती हैं।
खेतों पर खड़ी फसलों में वसंती रंग के फूलों की अनुपम छठा बिखेरने लगते हैं। मौसम वैज्ञानिक डा. संदीप कुमार कहते हैं कि वसंत ऋतु फसलों के लिए वरदान है। इस ऋतु में सभी फसलें पककर तैयार होती हैं। सम मौसम होने के चलते यह ऋतु किसानों के लिए वैभव लाने वाली साबित होती है।
चिकित्सकीय दृष्टि कोण में ऋतु का प्रभाव-वसंत ऋतु के बाद मौसम परिवर्तन के इस मिलाप को चिकित्सक सेहत के मामले में सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। डा. अरुण तिवारी कहते हैं कि मौसम बदलने पर व्यक्ति को अपने शरीर का तापमान भी उसी के अनुसार ढालने में समय लगता है।
इस दौर में मानव शरीर पीत ज्वर, नजला, खांसी और जुकाम से पीड़ित हो सकता है। इस मौसम में सुबह और शाम की सर्दी का बचाव किया जाना नितांत आवश्यक है।