जिले में बेटियों की स्थिति काफी खराब है। शिक्षा के मामले में जैसे-जैसे क्लास बढ़ती है वैसे ही छात्राओं की संख्या में गिरावट आती रहती है। अफसर एक दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं।
वर्ष 2001 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार प्राइमरी शिक्षा में 87086 बालकों की तुलना में 77095 बालिकाएं ही शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। इसमें मिलिड क्लास की कक्षाओं में सिर्फ 60322 छात्राएं ही पहुंच पाई। हायर सेक्रेंड्री में 63746 बालकों के सापेक्ष मात्र 26813 बालिकाओं को शिक्षा प्रदान की जा रही हैं।
इंटरमीडिएट में इस संख्या में लगभग 10 हजार की कमी रही। यानी इंटर की कक्षा तक मात्र 16164 ही छात्राएं पहुंच पाईं। इसी तरह जिले में स्नातक स्तर की शिक्षा तक पहुंचते-पहुंचते 31424 बालकों के सापेक्ष बालिकाओं की संख्या 8694 पर पहुंच गई।
अभावों में पलकर अनुपम ने दिखाई प्रतिभा- प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती। यह अमीर हो या गरीब किसी भी वर्ग में पाई जा सकती है। इसी का उदाहरण शहर की कु.अनुपम सेठ हैं। चार साल की उम्र में पिता का साया छिन जाने के बाद मां शर्मिष्ठा गुप्ता ने खुद भूखे रहकर अपनी दो बेटियों और एक बेटे को जीने की कला सिखाई।
किताबों के लिए पैसा न होेने के बाद भी पड़ोसियाें के बच्चों की किताबों से पढ़कर स्नातक डिग्री धारक बनी अनुपम इस समय बकालत कर रहीं हैं।
वर्ष 2005 में 51वें प्रादेशिक माध्यमिक विद्यालय कबड्डी एवं खो-खो प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाली कु.अनुपम सेठ ने साउलीन इंटरनेशनल मार्शल आर्ट संस्था से शितोरियू कराते दो स्टाइल में ब्लैक बेल्ट हासिल करके अपनी प्रतिभा के साथ ही अपना आत्मबल भी प्रदर्शित किया है।
आज अनुपम सेठ अपनी इसी प्रतिभा के बल पर स्कूली बच्चों को कराते की कला सिखाकर अपनी मां के साथ आर्थिक हाथ बंटा रही है। अनुपम की इच्छा है कि वह टीचर बने।