औरैया। बीहड़ में राज करने वाली दस्यु कुसुमा को अपनी मां से बहुत प्रेम था। मां के लिए अपशब्द बोलने पर कुसुमा ने उस डकैत लालाराम का साथ भी छोड़ दिया था।
जिसकी अगुवाई में उसने अस्ता में नरसंहार को अंजाम दिया था। सरेंडर के दौरान उसने मां की मौत के बाद फांसी की सजा सुनाए जाने की गुहार लगाई थी।
जालौन जिले के टिकरी निवासी कुसुमा नाइन व माधव मल्लाह का प्रेम उसके परिजनों को नागवार गुजरा था। दिल्ली जाने के दो साल बाद उसके पिता ने पुलिस की मदद से उसको पकड़वाकर घर बुलवा लिया था।
इसके बाद उसकी कुरौली निवासी केदार नाई के साथ शादी कर दी। शादी के कुछ साल बाद ही माधव ने अपने रिश्तेदार दस्यु विक्रम मल्लाह की मदद से कुसुमा को अगवा करवा लिया था। यहीं से कुसुमा सामान्य महिला से दस्यु बन गई।
आठ साल बाद विक्रम की मौत के बाद उसने दस्यु लालाराम के गैंग का दामन थाम लिया था। 26 मई 1984 में उसने लालाराम व श्रीराम के साथ मिलकर बेहमई कांड में हुई 22 लोगों की निर्मम हत्या का बदला अस्ता में 14 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था (जैसा कि अस्ता में बने स्मारक में दर्ज है)।
इसके कुछ समय बाद लालाराम ने कुसुमा की मां को अपशब्द बोले दिए थे। इससे आहत कुसुमा लालाराम के गैंग से किनारा कर फक्कड़ बाबा गैंग के गैंग का हिस्सा बन गई थी।
उसने कई अपहरण, हत्या, डकैती आदि घटनाओं को अंजाम देकर अपने नाम की दहशत बना दी थी। लोग कुसुमा की गिनती उस दौर की सबसे क्रूर डकैतों में करते थे।
वर्ष 2004 में मध्य प्रदेश के भिंड जिले में उसने फक्कड़ महाराज व गैंग के अन्य सदस्यों के साथ सरेंडर कर दिया था। सरेंडर करने के दौरान उसने अपनी मां की मौत के बाद फांसी दिए जाने की गुहार लगाई थी।
कुसुमा की मौत के बाद अपनों की याद में छलकीं अस्ता वासियों की आंखें
औरैया। जेल में बंद दस्यु कुसुमा नाइन की गंभीर बीमारी के चलते इलाज के दौरान रविवार को लखनऊ में मौत हो गई। इसकी जानकारी पर अस्ता के लोग खुश हो उठे। उन्होंने एक दूसरे को मिठाई खिलाने के साथ घी के दीये जलाकर खुशी जाहिर की।
वहीं 14 लोगों के नरसंहार में मारे गए अपनों की याद में उनकी आंखें छलक आईं। घटना के प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुसुमा और उसके साथियों ने महिलाओं और बच्चों पर भी रहम नहीं किया था। नरसंहार के बाद गांव को आग लगा दी थी। उस वक्त लोगों के पास खाने के लिए भी कुछ नहीं बचा था। (संवाद)
ग्लानि से चली गई मां की जान : मंगल सिंह
औरैया। अस्ता निवासी मंगल सिंह ने बताया कि वह गांव के प्रधान थे। 26 मई 1984 को उनके पिता बाहर गए थे। उसी दिन दस्यु कुसुमा, लालाराम और श्रीराम ने गैंग के साथ गांव में धावा बोल दिया। पिता के न मिलने पर डकैतों ने उनकी मां को पकड़ कर गांव वालों के सामने जलील किया।
असलहे व कारतूस के लिए रुपये न मिलने पर कुसुमा ने उनकी मां के ऊपर फायर झोंक दिया। गोली उनकी मां को न लगकर एक डकैत को लग गई। कुसुमा व अन्य डकैत अपने घायल साथी को देखने लगे। तभी मां ने बीहड़ में जाकर अपनी जान बचाई। आत्मग्लानि के चलते घटना के कुछ साल बाद उनकी मां की मौत हो गई। (संवाद)
भलै मर गई, हमाए पति व देवर को मारा था : रामदुलारी
औरैया। अस्ता की बुजुर्ग रामदुलारी को अब सुनने में परेशानी होती है। दस्यु कुसुमा नाइन की मौत के बारे में उनसे पूछा तो वह खुश हो गईं। कहा कि भलै मर गई। हमाए पति धनीराम व देवर महादेव को मार डाला था। बोलीं-कुसुमा ने उन्हें व उनकी देवरानी सोमवती को विधवा बना दिया। इसी तरह सबकी जुबान पर अपनों को खोने की दास्तां थी। (संवाद)
जर्जर होता जा रहा अस्ता का स्मारक
औरैया। नरसंहार से बदहाल हुआ अस्ता गांव आज भी पूरी तरह से खुशहाल नहीं हो सका है। बीहड़ में गैंग सक्रिय रहने के दौरान लोगों का सूरज ढलने के बाद और निकलने से पहले घरों से निकलना बंद हो गया था।
वर्ष 2004 में दस्यु कुसुमा ने सरेंडर किया तो वर्ष 2004 में गांव में नरसंहार में जान गंवाने वालों की याद में स्मारक बनाया गया। जोकि जर्जर होता जा रहा है। लोगों का कहना कि गांव आज भी खुशहाल नहीं हो पाया है।
अब यमुना नदी में आने वाली बाढ़ उनके लिए मुसीबत बनी हुई है। प्रशासन ने उनको ऊंचे स्थान पर बसाने का आश्वासन दिया था लेकिन अभी तक पूरा नहीं हुआ है। (संवाद)