यमुना पट्टी के चंबल सेंचुरी क्षेत्र पर दबंगों ने अवैध मछली कारोबार का जाल बिछा रहा है। असरदार लोगों की शह पर फल-फूल रहे इस कारोबार से प्रशासन को लाखों रुपये राजस्व का नुकसान हो रहा है। यहां से पकड़ी गईं मछलियां कानपुर, आगरा, दिल्ली और मुंबई की मंडियों में भेजी जाती हैं।
वर्ष 1978 से विशेष नियम के तहत बने यमुना पट्टी के चंबल सेंचुरी क्षेत्र को शिकार, खनन व जल निकासी के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। बावजूद इसके यहां रोजाना लाखों रुपये का मछली का अवैध कारोबार चल रहा है।
क्षेत्र में बड़े पैमाने पर रेहू, नरेन, चायना, रीठा, रानी, बाम, बंधुना, टेंगन, कतला, पड़ीन सौर, बमकरा आदि प्रजातियों का शिकार हो रहा है। रातों रात मछलियों की खेप कानपुर नगर, आगरा, दिल्ली और मुंबई को निकाल दी जाती है।
विशेष प्रकार के बने वाहनों से मछली को जिंदा व्यापार स्थल पर पहुंचाने की पूरी व्यवस्था रहती है।
अवैध मछली कारोबारी स्थानीय मछुआरों की गरीबी का फायदा उठ मछलियों का शिकार करने को मजबूर करते हैं। शिकार के एवज में उन्हें सिर्फ मजदूरी का भुगतान किया जाता है।
इस संबंध में उच्चाधिकारियों से शिकायत की गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। मामला खुलने पर शिकायतकर्ता से मारपीट कर उसकी आवाज को दबा दिया गया। समय रहते चंबल वन सेंचुरी क्षेत्र से अवैध शिकार पर अंकुश न लगा तो यह क्षेत्र दुर्लभ प्रजातियों से खाली हो जाएगा।
क्या है चंबल सेंचुरी- वर्ष 1978 में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश व राजस्थान सरकारों ने जलीय जीव जंतुओं के संरक्षण को विशेष अभियान चलाया था, जिसमें बहुआ, डाल्फिन, घडियाल व मगरमच्छों का संरक्षण किया जाता है।
इस कार्य के लिए विशेष अधिसूचना जारी कर 2100 वर्ग मील में राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी क्षेत्र घोषित कर दिया गया। अधिसूचना के तहत मछली का शिकार करना प्रतिबंधित है।
क्या है अधिसूचना के नियम- चंबल सेंचुरी के निर्धारण क्षेत्र में शिकार, खनन, पानी का व्यवसायिक निकासी पर प्रतिबंध लगाया गया था। नियमों की अवहेलना करने पर तीन वर्ष की सजा और जुर्माना का प्रावधान है। अवैध कारोबार पर नजर रखने के लिए लगातार पेट्रोलिंग किए जाने के निर्देश थे।
वन कर्मियों की कमी है। इसके बावजूद वह पूरे क्षेत्र की निगरानी करा रहे हैं। अब जनता को भी जागरूक होना चाहिए, तभी अवैध शिकार और कारोबार पर अंकुश लग सकेगा।- अनिल कुमार पटेल (डीएफओ, वन सेंचुरी आगरा)