उत्तर प्रदेश के लखनऊ में अगर होर्डिंगों व नेताओं की बात को संकेत माना जाए तो भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी छोटे होते जा रहे हैं। लालकृष्ण आडवाणी भले ही मना लिए गए हो लेकिन नेताओं के लिए अब वह बहुत अपरिहार्य नहीं रहे हैं।
अमित शाह की अगवानी के लिए लखनऊ में लगी होर्डिंगों और बाद में बैठक के भीतर हुई कार्यवाही ने आज कुछ यही निष्कर्ष दिए हैं।
इस निष्कर्ष पर मुहर लगा दी बैठक में प्रदेश प्रभारी व मोदी के करीबी अमित शाह की इस बात ने, ‘अब राष्ट्रीय अध्यक्ष और नरेन्द्र भाई मोदी को मिलकर और आप सभी कार्यकर्ताओं के सहयोग से कांग्रेस मुक्त देश बनाना है।’
बुधवार को भाजपा मुख्यालय और आसपास अमित शाह के स्वागत में बड़े पैमाने पर होर्डिंग और कटआउट लगाए गए थे। यह कटआउट आने-जाने वाले लोगों के लिए अंदर चल रही बैठक से बड़ी खबर थे। भाजपा के भीतर की कहानी बता रहे थे।
एक बुजुर्गवार मुख्य गेट पर लगे बैनर को निहारते हुए बोले, ‘अरे! इस पर अटल व आडवाणी की तो फोटो ही नहीं है।’ पास खड़े एक अधेड़ कार्यकर्ता ने बात पूरी की, ‘अब पार्टी को अटल व आडवाणी की नहीं, अमित शाह की जरूरत है।’ भीतर अमित शाह बैठक कर रहे थे।
पर, बाहर उस बैठक की खबर से ज्यादा बड़ी खबर लोगों को आडवाणी का होर्डिंगों से गायब हो जाना और अटल की फोटो अमित शाह से छोटी हो जाना लग रहा था। कुछ यह भी कह रहे थे कि दारुलशफा के गेट नंबर तीन पर भाजपा में सक्रिय एक छात्र नेता की तरफ से लगवाई गई होर्डिंगों पर तो आडवाणी ही नहीं अटल विहारी वाजपेयी तक की फोटो नहीं है।