कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले ऐतिहासिक तिगरीधाम मेले में आस्था का सैलाब उमड़ रहा है। गंगा किनारे बुधवार शाम से पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए दीपदान करने वालों की भीड़ उमड़ने लगेगी। दीपदान की परंपरा नई नहीं है, बल्कि महाभारत काल के दौर से चली आ रही है।
मान्यता है कि महाभारत काल के युद्ध के समय मारे जाने वाले लोगों की आत्मा की शांति के लिए पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण की मौजूदगी में दीपदान किया था। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। तिगरीधाम में लगने वाले ऐतिहासिक-पौराणिक मेले को मिनी कुंभ भी कहा जाता है। इस बार 15 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा का मुख्य स्नान है। इसकी पूर्व संध्या (कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी की शाम) दीपदान किया जाता है। इसलिए 14 नवंबर को दीपदान किया जाएगा। तिगरीधाम, गढ़मुक्तेश्वर मेले के साथ ब्रजघाट पर भी गंगा घाटों पर दीपदान के लिए लोगों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
सूर्यास्त के समय होता है दीपदान
धार्मिक अनुष्ठान के लिए सूर्यास्त के समय वह श्रद्धालु आएंगे, जिनके परिवार के सदस्य उनके बीच अब नहीं रहे। दीपदान उन्हीं दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए संबंधित परिवार के लोग करते हैं। ऐसे में उनकी आंखें भी भर आती हैं। इस परंपरा को निभाते वक्त गंगा घाट ऐसे प्रतीत होते हैं, जैसे आकाश के तारे धरती पर उतर आए हों। श्रीबाबा गंगानाथ मंदिर के पंडित आशुतोष त्रिवेदी ने बताया कि द्वापर युग में कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव सेना व पांडवों के कुटुंब संबंधियों के शव पड़े थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन सभी दिवंगत आत्माओं की शांति का मार्ग पांडवों को बताया था। तब पांडवों ने भगवान कृष्ण के साथ गंगा तट पर पहुंच कर दीपदान किया था। उस दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी की पूर्व संध्या थी।