फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Amroha News: अमरोहा का साकी... जिसकी शायरी ने दुनिया को किया मदहोश

विज्ञापन
विज्ञापन
अमरोहा। अदबी दुनिया की बात हो और अमरोहा का जिक्र न आए, ऐसा मुमकिन नहीं है। इस सरजमीं से निकले एक से बढ़कर एक शायरों ने अपने फन से न केवल खुद की पहचान बनाई, बल्कि अमरोहा को भी खास मुकाम दिलाया। यहां से शायरी के शिखर तक पहुंचने वाले कलमकारों की लंबी फेहरिस्त है। इन्हीं में एक नाम है सैय्यद कायम रजा नकवी। उन्हें शायरी की दुनिया में साकी अमरोहवी के नाम से भी जाना गया।
विज्ञापन

बिजनौर रोड स्थित शाह विलायत दरगाह के सामने से एक रास्ता मोहल्ला हक्कानी होते हुए पचदरा तक पहुंचता है। यही वह मोहल्ला है जहां साल 1925 में सैयद अली कासिम के घर में सैयद कायम रजा नकवी का जन्म हुआ। पिता की इच्छा थी कि बेटा अच्छी तालीम लेकर जिंंदगी में एक अलग मुकाम पाए लेकिन सैयद कायम रजा नकवी ने अलग राह चुनी और मुशायरों में शिरकत करने लगे।
कारवाने खुलूस संस्था के अध्यक्ष महबूब हुसैन जैदी कहते हैं कि सैयद कायम रजा नकवी अपने पिता की ऊंची तालीम लेने की इच्छा तो पूरी न कर सके लेकिन उनकी दूसरी इच्छा को उन्होंने जरूर पूरा किया। शायरी की दुनिया में उन्होंने एक अलग मुकाम बनाया। जहां वह साकी अमरोहवी के नाम से पहचाने गए। आजादी के बाद हुए बंटवारे में उनका परिवार पाकिस्तान के कराची में जाकर बस गया, जहां उनकी शायरी को खूब तवज्जो मिली। 12 दिसंबर 2005 को कराची में उनका इंतकाल हो गया।
विज्ञापन



रईस अमरोहवी के खास दोस्त थे साकी
महबूब हुसैन जैदी के अनुसार साकी अमरोहवी रईस अमरोहवी के खास दोस्तों में थे। वह एक साथ शायरी की महफिल सजाया करते थे। वह बताते हैं कि जिस वक्त साकी अमरोहवी पाकिस्तान गए तो वहां रईस अमरोहवी ने उनसे पूछा, कि आजकल क्या कर रहे हो। इस पर शायरी के साथ साकी ने कहा कि, शहरे हुनर में अलग-अलग है दोनों की पहचान, तुम ने अपना फन बेचा है, हमने अपना पान, जीते जी तो करना होगा, जीने का सामान, दुनिया वालों तुम ही बताओ फन बेचूं या पान।


म्युनिसिपल काॅरपोरेशन में नौकरी से हुई शुरुआत
महबूब हुसैन जैदी के मुताबिक पाकिस्तान जाने के बाद साकी अमरोहवी ने कराची में म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में नौकरी की लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा। उनका झुकाव शायरी की ओर बढ़ रहा था। इसी वजह से पाकिस्तान के शायर मीर जव्वाद अली से शायरी की बारीकियां सीखीं और देश-विदेश में होने वाले मुशायरों में शिरकत करने लगे।
-

सोशल मीडिया पर खूब सुने जाते हैं साकी
साकी अमरोहवी की शायरी कहने का अंदाज बहुत जुदा था। उनकी शायरी को सुनने के लिए लोग उनका इंतजार किया करते थे। महबूब हुसैन जैदी के अनुसार उनकी आवाज की खनक लोगों को सुनने और बैठने को मजबूर करती थी। आज सोशल मीडिया पर उनकी शायरी को खूब सुना जाता है। साल 1990 में दुबई में आयोजित हुए जश्न-ए-जाॅन एलिया में भी उन्होंने अपने कलाम पढ़े थे, जहां उनको खूब दाद मिली थी। साकी के प्रमुख काव्य संग्रह इफ्ताद और मगर शाम होती जा रही है... हैं।
विज्ञापन



साकी की कलम की एक झलक

मंजिलें लाख कठिन आएं गुजर जाऊंगा
हौसला हार के बैठूंगा तो मर जाऊंगा,
चल रहे थे जो मेरे साथ कहां हैं वो लोग
जो ये कहते थे कि रस्ते में बिखर जाऊंगा।
दर-ब-दर होने से पहले कभी सोचा भी न था
घर मुझे रास न आया तो किधर जाऊंगा,
याद रखे मुझे दुनिया तेरी तस्वीर के साथ
रंग ऐसे तेरी तस्वीर में भर जाऊंगा।
लाख रोकें ये अंधेरे मेरा रास्ता लेकिन
मैं जिधर रोशनी जाएगी उधर जाऊंगा,
रास आई न मोहब्बत मुझे वर्ना ''''साकी''''
मैंने सोचा था कि हर दिल में उतर जाऊंगा।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें