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Amroha News: शायरी में पिता और परिवार की विरासत को आगे बढ़ा रहीं रूखसार अमरोही

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रूखसार अमरोही।
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अमरोहा।
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यूं तो एक से बढ़कर एक शायरों ने अमरोहा को एक नई पहचान दिलाई है, लेकिन इन सबके बीच एक शायरा ऐसी भी हैं, जो अपनी शायरी के जरिये अपने परिवार की विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। बात कर रहे हैं मशहूर गीतकार व फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही की बेटी रूखसार अमरोही की। जो, आज भी बाबा (कमाल अमरोही) की यादों को संवारने का काम कर रही हैं।

शायरी की दुनिया में अमरोहा का नाम बड़े ही अदब के साथ लिया जाता है। न केवल बॉलीवुड में जिले के शायरों ने अपनी जमीन बनाई, बल्कि देशभर में होने वाले मुशायरों में भी यहां के शायरों ने शिरकत कर कलामों से अमरोहा का नाम बुलंद किया है। इन्हीं में एक नाम शामिल है कमाल अमरोही की बेटी रूखसार अमरोही का। जो, अपने बाबा और परिवार की शायरी की विरासत को संजोकर आगे बढ़ा रही हैं।
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साल 1951 को मुंबई में जन्मीं रूखसार का बचपन अमरोहा में ही गुजरा। रूखसार बताती हैं कि जब वह अमरोहा आई तो उस समय मशहूर शायर व उनके चाचा जॉन एलिया समेत सभी शायर पाकिस्तान जा चुके थे, लेकिन परिवार में उनके किस्से सुनने को मिलते थे। वह बताती हैं चाचा जॉन जब यहां आए तो वह उनके खासी प्रभावित हुईं। उनकी बातों और उनकी शायरी को सुनकर उनमें भी लिखने की ललक जागने लगी। इसके बाद से शायरी में उनकी कलम चलने लगी।
चाचा जॉन ने बढ़ाया लिखने का हौसला
रूखसार अमरोही बताती हैं कि उनका बाबा और चाचा जॉन से बहुत लगाव था। जब भी वह यहां आते अधिकांश समय उनके साथ ही गुजरता था। चाचा जॉन उनको खानदान की आखिरी शायरा कहकर पुकारते थे, जबकि बाबा उनको अदीबा कहकर पुकारते थे। उनको उम्मीद थी रूखसार ही उनकी शायरी की विरासत को आगे लेकर जाएगी, लेकिन जब बाबा का इंतकाल हुआ ताे वह टूट चुकी थी। इस पर चचा जोन ने उनका हौसला बढ़ाते हुए कलम के जरिए बाबा को खिराज-ए-अकीदत देने को कहा। उन्हाेंने कहा कि बाबा और तुम्हारे बीच पानी का दरिया (आंसू) बीच में नहीं आने चाहिए। उन्होंने लिखने के लिए प्रेरित किया। जिसके बाद जोन ने उनको एक लाइन दी ‘मुझकों तुमसे बहुत शिकायत है’ इसको पूरा करने के लिए अगली लाइन रूखसार अमरोही से बोलने के लिए कहा। जिसपर उन्होंने उसे पूरा करते हुए लिखा, ‘यही शायद मेरी मोहब्बत है।’ यहीं उनका पहला शेर बन गया। जिसको बाद में उन्होंने गजल के रूप लिखा।
उपराष्ट्रपति ने किया था किताब का विमोचन

रूखसार अमरोही द्वारा लिखी गई किताब ‘दर्दे दिल लिखूं कब तक’ का विमोचन 2012 में दिल्ली में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने किया था, लेकिन उनकी तमन्ना थी, इस किताब का विमोचन अमरोहा में बाबा की हवेली पर भी हो। यहीं बाबा को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इसके बाद अमरोहा में भी उनकी इस किताब का विमोचन तत्कालीन डीएम व एसपी के हाथों किया गया था।
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आज भी बाबा की यादों को संजोती हैं रूखसार : रूखसार अमरोही और उनका परिवार यूं तो मुंबई में रहता है, लेकिन जब भी मौका मिलता है, वह अमरोहा जरूर आती हैं। आज भी उन्होंनें बाबा की यादों को संजोया हुआ है। बाबा के कपड़ाें से लेकर उनके इस्तेमाल की हुई कई चीजों को वह संजोने का काम कर रही हैं।
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