कस्बे में नौ मोहर्रम का आखिरी मातमी जुलूस मोहल्ला गूला तालाब स्थित इमामबाड़ा सैय्यद मोहम्मद नूर से जुमन-ए-हैदरी के तत्वावधान में बरामद हुआ। जुलूस में शामिल अजादारों ने जंजीरों से मातम करने के साथ ही दहकते अंगारों पर चलकर बीबी फात्मा को लख्ते जिगर बेटे इमाम हुसैन की शहादत का पुरसा दिया।
शनिवार दोपहर एक बजे शुरू हुए जुलूस में अजादार नौहेख्वानी करते हुए चल रहे थे। शुरुआत से पहले कुरान की तिलावत भी की गई। जुलूस में हजारों की तादाद में नंगे सिर-नंगे पैर अजादार लब्बैक या हुसैन कीं सदाएं बुलंद करते हुए चल रहे थे। जुलूस की शुरुआत से पहले मौलाना अब्बास ने इमामबाड़े में मजलिस को खिताब किया। इसमें उन्होंने यजीद की फौज के जरिये मैदान-ए-कर्बला में पानी पर पहरा लगाने का पूरा वाकया सुनाया।
बताया कि भीषण गर्मी के बीच रेगिस्तानी इलाके में तीन दिन से बच्चे भूख और प्यास से तड़प रहे थे। हजरत अब्बास अपने बड़े भाई हजरत इमाम हुसैन से इजाजत लेकर नहरे फरात से मश्क से पानी भरने गए, जहां यजीदी फौज ने धोखे से तीरों की बौछार कर हजरत अब्बास को शहीद कर दिया। हमले में दोनों बाजुओं के जिस्म से अलग होने का वाकया सुनते ही अजादारों की आंखों से आंसू बहने लगे। जुलूस के मेन बाजार में पहुंचने पर अजादारों ने जंजीरों से मातम कर खुद को लहूलुहान कर लिया।
हफ्ता बाजार में दहकते अंगारों पर चलकर इमाम हुसैन की शहादत का गम मनाया। मातमदारी के बीच फिजा में या हुसैन-या हुसैन कीं सदाएं गूंजती रहीं। जुलूस देर शाम वापस इमामबाड़ा सैय्यद नूर पहुंचकर संपन्न हुआ। इस दौरान अंजुमन के अध्यक्ष मोहम्मद अब्बास, सिब्ते हैदर, तारिक रजा, कौसर अब्बास, मौलाना हसन मुज्तबा आदि मौजूद रहे। वहीं, नौ मोहर्रम को लेकर घरों में भी जिक्र-ए-हुसैन के बीच नजर-ओ नियाज का सिलसिला देर रात तक जारी रहा।