मुशायरे की शुरुआत कुरआन-ए-पाक की तिलावत से कारी अहसान ने की। मतीन अमरोहवी ने कहा...चमकते हैं जो हर नगीने में दोनों, मिले मुझको मक्के मदीने में दोनों। प्रोफेसर नासिर नकवी ने इस तरह कहा...ये अपनी बेजारियों से पूछें खड़ा हुआ है बवाल कैसा, अकीदे मजरूह हो रहे हैं नबी के शीशे में बाल कैसा। जुबैर इब्ने सैफी ने कहा...अपने अमल से पहले हम पर तो बन जाएं आका का, फिर आका की शान के शया जश्न मनाएं आका का। शीबान कादरी ने पढ़ा...दुआएं उनके वसीले से मांगता हूं जब, कुबूलियत की उसी दम सनद पहुंचती है। लाड़ले रहबर ने ऐसे पढ़ा...मैं गुनाहों के तसव्वुर से लरज जाता हूं, ऐसा लगता है कोई देख रहा हो जैसे। इनके अलावा साद अमरोहवी, डाॅ.नासिर अमरोहवी, हबीब अहमद एडवोकेट, डाॅ.मुबारक अमरोहवी, गुलजार अमरोहवी आदि शायरों ने भी अपने-अपने कलाम पेश किए। इस दौरान जाकिर काजमी, हाजी नसीम खां, सरताज आलम मंसूरी, हाजी खुर्शीद अनवर, मंसूर अहमद, इकबाल खां, सभासद फहीम शाहनवाज, अब्दुल कय्यूम रायनी आदि मौजूद रहे। संयोजक एवं संचालक असलम उस्मानी ने सभी का आभार जताया।