गर्भवती महिलाओं में खून की कमी को दूर करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत नेशनल आयरन प्लस इनीशिएटिव योजना सहित अनेक कार्यक्रम का संचालन किया जा रहा है, जिसके तहत गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को आयरन और प्रसव के बाद गोलियां दी जाती हैं, लेकिन कार्यक्रम को सही तरीके से अंजाम नहीं दिए जाने के चलते ही इसका असर नहीं दिख रहा है। जिससे जागरूकता के अभाव में महिलाएं एनीमिया की चपेट में आ रही हैं।
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रियंका सिंह ने बताया कि गर्भवती महिलाओं में अक्सर खून की कमी पाई जा रही है। उनका कहना है कि अस्पताल आ रही गर्भवतियों में से 70 प्रतिशत महिलाओं में छह से आठ ग्राम प्रति डेसीलीटर पाया जाता है, जबकि नौ से दस ग्राम प्रति डेसीलीटर होना चाहिए। ओपीडी में आ रही दो सौ महिलाओं में प्रतिशत महिलाएं एनीमिक पाई जाती हैं।
इसका प्रमुख कारण संतुलित और पौष्टिक खानपान की कमी के साथ ही अस्पताल से मिलने की वाली आयरन की गोली का नहीं लेना है। इसके अलावा गर्भावस्था में नियमित रूप से डॉक्टर को प्रतिमाह नहीं दिखाना भी एक बड़ा कारण है। प्रति माह डॉक्टर से परामर्श लेने एवं समय-समय पर जांच होने पर रक्त की कमी पूर्ति की जा सकती है। बताई गई दवा एवं खानपान का ध्यान रखने पर एनीमिया से होने वाली परेशानी से बचा जा सकता है। एनीमिया की स्थिति में आने पर दवा के साथ इंजेक्शन भी लगाए जाते हैं।
शरीर में रक्त की कमी के लक्षण
थकान, कमजोरी, शरीर का पीला पड़ना, दिल की धड़कन का सामान्य न होना, सांस लेने में तकलीफ, चक्कर आना, सीने में दर्द, हाथों और पैरों का ठंडा होना एवं सिरदर्द है।
शरीर की रक्त की कमी से होने वाली परेशानी
शरीर में रक्त की कमी से आलस्य बने रहना, चिड़चिड़ापन, पढ़ाई एवं किसी कार्य में मन न लगना, नींद अधिक आना, किसी कार्य में मन न लगना जैसी परेशानी होती है।
ये हैं पिछले चार सालों के आंकड़े
विभागीय आंकड़ों के अनुसार अमरोहा में अप्रैल 2020 से 2021 तक 8644 गर्भवती महिलाओं की जांच की गई। जिसमें 440 उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाएं चिह्नित की गईं। अप्रैल 2021 से मार्च 2022 तक 12,524 गर्भवती महिलाओं की जांच की गई। जिसमें 778 उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाएं चिह्नित की गईं। अप्रैल 2022 से मार्च 2023 तक 15,601 गर्भवती महिलाओं की जांच की गई। जिसमें 1467 उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाएं मिली थीं। अप्रैल 2023 से 2024 अब तक 15,601 गर्भवती महिलाओं की जांच की गई, जिसमें 1467 महिलाओं में सात ग्राम से भी कम खून पाया गया। इस कारण इन्हें हाई रिस्क श्रेणी में रखा गया था।