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कारगिल युद्ध में 21 दुश्मनों को ढेर कर सीने पर खाई थी 11 गोली

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अमरोहा। खेलने कूदने की उम्र में देश के लिए अमरोहा का लाल 21 साल की उम्र में कारगिल युद्घ में शहीद हो गया। कारगिल में 21 दुश्मनों को ढेर करके सिर-सीने पर 11 गोली खाकर देश के लिए कुर्बान दी थी। उनकी शहादत पर परिजन ही नहीं पूरा जिला गर्व करता है। उनकी कुर्बानी की दास्तान बताते बुजुर्ग माता-पिता रो-पड़ते हैं। अब ये शहीद का गांव मिलक छावी को अरविंद नगर मिलक के नाम से जाना जाता है।
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कारगिल के अघोषित युद्ध में प्राणों की आहुति देने वालों में अमरोहा का भी एक लाल भी शामिल था। अमरोहा मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर दूर स्थित गांव मिलक छावी निवासी किसान मुखत्यार सिंह के पांच बच्चों में अरविंद सबसे बड़ा थे। खेलने कूदने की उम्र में अरविंद देशभक्ति का जूनुन चढ़ा था। वर्ष 1996 में अरविंद सेना में भर्ती हुए। उनकी तैनाती 22 ग्रेनेडियर्स बटालिन में थी। दो साल नौ माह ड्यूटी करने के बाद अप्रैल 1999 में अरविंद दो माह की छुट्टी पर गांव आए थे। अरविंद 13 जून 1999 को ड्यूटी पर वापस लौटने लगे। तभी कारगिल युद्घ शुरू हो गया। जिसपर परिजनों ने अरविंद से एक महीने और अवकाश लेने की सलाह दी। लेकिन अरविंद नहीं माने, उन्होंने परिजनों को वतन पर मर मिटने का फर्ज याद दिलाया। पिता मुख्त्यार बताते है कि अरविंद रणभूमि में पीठ नहीं, सीने पर गोली खाने की बात करते थे। इसके बाद वह कारगिल के लिए रवाना हो गए थे। बताया जाता है कि आपरेशन विजय के दौरान बटानिक 22 ग्रेनेडियर्स की ब्रावो कंपनी को प्वाइंट 5287 पर कब्जा करने का टास्क मिला था। 25/26 जून 1999 को दुश्मनों ने अग्रमिम जमाव क्षेत्र में भारी आर्टी बमबारी करना शुरू कर दिया। यह बमबारी अचानक कोने से सेना आश्चर्यचकित हो गई। हथियार और उनके सेक्शन के उपकरण को पुन प्राप्त काने के लिए इलाके में भारी बमबारी होने लगी। इस दौरान ग्रेनेडियर अरविंद सिंह ने हथियार और गोला बारूद को सही जगह पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस बीच उन्होंने दुश्मन के 21 जवानों को मौत के घाट उतार दिया। बाद सीने और सिर में 11 गोली खाकर शहीद हो गए। 29 जून को तिरंगे में लिपटा अरविंद का शव गांव पहुंचा।
कुशलक्षेम के तार से पहले पहुंच गया था शव
अमरोहा। दो महीने की छुट्टी काटने के बाद अरविंद 13 जून 1999 को डयूटी पर लौटे थे। यहां पहुंचने के बाद अरविंद ने 22 जून को अपने कुशलक्षेम का तार लिखकर परिजनों को भेजा था। लेकिन इसी बीच 25/26 जून को वह कारगिल में शहीद हो गए थे। 29 जून को शाम के समय उनका शव गांव पहुंचा था। अभी परिवार गम से उभरा नहीं था, कि इसके चार दिन बाद तीन जुलाई को अरविंद के कुशलक्षेम का तार पहुंचा। जिसमें उन्होंने लिखा था कि वहां के हालात सामान्य है और वह सकुशल पहुंच गए हैं। कुशलक्षेम का तार पढ़कर परिवार फिर से उनके गम में डूब गया।
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शहीदी गेट और अस्पताल का वादा नहीं हुआ पूरा
अमरोहा। शहीद के नाम से पेट्रोल पंप, गांव में अरविंद के नाम पर प्राइमरी स्कूल और शहीदी गेट का निर्माण, 25 बेड का सरकारी अस्पताल और गांव का नाम अरविंद नगर करने का वादा करके गए थे। इनमें पेट्रोल पंप, प्राइमरी स्कूल खुलने और गांव का नाम अरविंद नगर मिलक करने के अलावा अन्य वादे आज तक पूरे नहीं हो सके है। अरविंद के भाई धर्मेंद्र सिंह बताते है कि कई बार शहीदी गेट के निर्माण और अस्पताल के लिए अफसरों से मांग की गई। लेकिन आज तक सुनवाई नहीं हुई।
दोस्तों को आखिरी सलाम ठोंक गया था अरविंद
अमरोहा। अरविंद के पिता मुखत्यार सिंह बताते हैं कि कारगिल युद्घ जाने से पहले पहले अरविंद अपने दोस्तों को दावत देकर गयाीथा। उसने दोस्तों से कहा था कि पता नही ं अब वापसी होगी या नहीं। इसलिए उन्होंने दोस्तों का दावत दी थी।
बेटे की शहादत को याद कर फफक पड़ते हैं माता-पिताहर साल मनाया जाता है अरविद बलिदान दिवस
अमरोहा। कारगिल में शहीद हुए अरविंद के माता-पिता उनकी शहादत को याद कर फफक पड़े हैं। रोजाना बेटे की तस्वीर देखकर जख्म हरे हो जाते हैं। मां चंद्रवती को 32 हजार रुपये पेशन मिलती है। शहीद अरविंद पांच भाई बहनों में सबसे बड़े थे। उनके भाई धर्मेंद्र सिंह के अलावा तीन बहने सुदेश देवी, शशि देवी और सर्वेश देवी हैं। चारों भाई-बहनों को शादी हो चुकी है।
अमरोहा। आर्यावर्त केसरी प्रबंध समिति के तत्वावधान में शहीद अरविंद सिंह की स्मृति में उनका बलिदान दिवस हर वर्ष मनाया जाता है। उनकी याद में राष्ट्र कल्याण यज्ञ और श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया जाता है।
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