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खनन पट्टे देने में फंसेगी अफसरों की गर्दन

Wed, 06 Apr 2016 12:42 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला अमरोहा
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गंगा नदी में रामसर साइट (वेटलैंड) का मानचित्र - फोटो : amar ujala
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राष्ट्रीय हरित न्यायालय(एनजीटी) में चल रहे अवैध खनन के केस में कई अफसरों की गर्दन फंसेगी। रामसर साइट में राज्य स्तर की एक अथॉरिटी से अनापत्ति लेकर गंगा की कोख खोखली की गई है। इससे जलीय जीवों को खतरा पैदा हुआ है। 
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ब्रजघाट से नरौरा तक का क्षेत्र रामसर साइट (वेटलैंड) विश्व धरोहर घोषित है। यहां दुर्लभ जलीय जीव-जंतुओं का बसेरा है। इलाके में खनन के पट्टे किए ही नहीं जा सकते हैं, जबकि खनन के पट्टे के लिए केंद्र की एनओसी जरूरी है।

वहीं वर्ष 2012 में राज्य सरकार ने खनन के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र में पट्टे जारी करने के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से एनओसी (अनापत्ति प्रमाणपत्र) लेने के बजाय राज्य स्तर की इंवायरमेंटल इम्पैक्ट असिस्मेंट अथॉरिटी से एनओसी कराके पट्टे जारी कर दिए। ब्रजघाट के पास गांव कबीरपुर में भी इसी तरह पट्टे जारी किए गए थे।
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इसके बाद खड़कपुर के लिए रेता भंडारण का ठेका भी इसी एजेंसी से एनओसी कराकर दे दिया गया। मामले को राष्ट्रीय हरित न्यायालय में दायर याचिका में भी शामिल किया गया है। 

एक और रिट की तैयारी
केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की संस्था पीपुल्स फार एनिमल (पीएफए)के प्रदेश प्रभारी डा. रविन्द्र शुक्ला का कहना है कि एनजीटी में एक और रिट दायर करने की उनकी तैयारी पूरी हो चुकी है। वो आठ अप्रैल को दिल्ली जाएंगे। 9 फरवरी 2012 को मेनका गांधी की शिकायत पर तत्कालीन वन संरक्षक अरविंद गुप्ता की ओर से की गई जांच की रिपोर्ट भी शामिल करेंगे। इस जांच में साबित हुआ था कि वन्य जीव संरक्षण क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत बालू खनन नहीं किया जा सकता। खनन से पहले राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड और पर्यावरण मंत्रालय की क्लीयरेंस लेना जरूरी है। 

जिला स्तरीय अधिकारी बोलने को तैयार नहीं
जिला स्तर के अधिकारी इस मामले में कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि न्यायालय का मामला है। जब पट्टे हुए तो उनकी तैनाती यहां नहीं थी। इसलिए वह कुछ भी नहीं कह सकते हैं।
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