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Amroha News: सुनने वालों को गुलाम बना लेती है गुलाम हमदानी की शायरी

Mon, 24 Mar 2025 01:59 AM IST
मुरादाबाद ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अमरोहा
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अमरोहा।
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अमरोहा के कई शायरों ने अदबी दुनिया में अपना यादगार मुकाम बनाया है। इनमें एक नाम गुलाम हमदानी मुसहफी का भी है। जो उर्दू के साथ अरबी और फारसी के भी बड़े जानकार थे।
अमरोहा के मोहल्ला काली पगड़ी में साल 1751 को गुलाम हमदानी का नाम जन्म हुआ। बचपन से ही उनका रुझान शायरी की ओर हो गया। अदबी दुनिया में उनको मुसहफी तखल्लुस यानी उपनाम से जाना गया। कम समय में ही गुलाम हमदानी मुसहफी को उर्दू और फारसी की शायरी की दुनिया में उस्ताद शायर के रूप में पहचान मिलने लगी थी। उनकी शायरी की वजह से उस समय की सल्तनत में भी उनको बड़ी तवज्जो दी जाती थी।
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गुलाम हमदानी मुसहफी पर शोध करने वाले अमरोहा के प्रोफेसर नाशिर नकवी बताते हैं कि उनके उर्दू शायरी के आठ दीवान और उर्दू और फारसी के मिले हुए तीन दीवान प्रकाशित हुए थे। एक दीवान अरबी में की शायरी का भी था, लेकिन वह प्रकाशित नहीं हो सका। उर्दू के क्षेत्र में आज भी मुसहफी का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। दुनिया भर में जहां भी उर्दू जुबान समझी या बोली जाती है, वहां लोग आज भी गुलाम हमदानी मुसहफी से पूरी तरह से वाकिफ हैं।
पुराने समय में रेख्ता के रूप में पहचान रखने वाली इस जुबान को उर्दू का नाम गुलाम हमदानी की ही देन है। उनकी शायरी और इतिहास को जानने के लिए बहुत लोगों ने उन पर शोध भी किए हैं। उनके अनुसार लखनऊ व दिल्ली में शायरी की महफिल में आज भी उनका नाम बड़े अदब से लिया जाता है। उन्होंने बताया कि मुस्लिम कमेटी अमरोहा की ओर से वर्ष 2021 में अमरोहा की दस आलमी शख्सियतों में गुलाम हमदानी मुसहफी को बतौर शायर शामिल किया गया था। उनके अनुसार साल 1824 में उनका इंतकाल हो गया।
मीर तकी मीर के समकालीन बताया
प्रोफेसर नाशिर नकवी के अनुसार गुलाम हमदानी अपने दौर के नामचीन शायर मीर तकी मीर व छन्नूलाल दिलगीर के समकालीन थे। उस दौर के बड़े उस्ताद शायर आतिश, असीर और मीर खलीक आदि सब मुसहफी के ही शागिर्द हुआ करते थे। उनके पिता उस समय की सल्तनत में बड़े पदों पर आसीन रहे, लेकिन सल्तनत के पतन के साथ ही उनको आर्थिक तंगी ने घेर लिया। इसके बाद आजीविका की तलाश में वह कई शहरों में रहे। वह नियमित रूप से मुशायरों में शिरकत करते और अपने घर पर भी मुशायरे आयोजित कराते थे।
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अपनी विरासत को बचाने आगे आए युवा पीढ़ी

प्रोफेसर नाशिर नकवी ने बताया कि अमरोहा में साहित्य की धरोहर कम नहीं हैं, लेकिन इसको बचाने के लिए युवा पीढ़ी को भी आगे आना होगा। हिंदी व उर्दू साहित्य से जुड़े रचनाकारों की याद में गोष्ठियों का आयोजन की युवा कर युवाओं को अपने इस समृद्ध इतिहास को जानने की जरूरत है।
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