दहशत का एक घंटा कलामपुर को ऐसा जख्म दे गया, जिसको कोई भी ग्रामीण भूल नहीं पाएगा। बवालियों का उमड़ा हुजूम हाथों में धारदार हथियार व पथराव करता गांव की गलियों से निकल रहा था, जिसको देखकर कोई खेतों की ओर जान बचाने के लिए भाग निकला तो कोई परिवार समेत कमरे में बंद हो गया।
दंगाइयों ने घर के दरवाजे तोड़ दिए। दीवारें ढहा दीं। मवेशियों को भी नहीं बख्शा। चीख-पुकार व शोरगुल की दहशत ने लोगों के दिलों को झकझोर दिया। अगर फोर्स नहीं आता तो गांव में कत्लेआम का नंगा नाच दिखाई देता।
रविवार की सुबह यूं तो ग्रामीणों ने भी नहीं सोचा था कि ज्यों ज्यों समय बढ़ेगा त्यों त्यों गांव के हालात बदलते जाएंगे। एक धार्मिक स्थल का निर्माण शुरू हुआ तो दूसरे पक्ष ने अपने धर्मस्थल पर निर्माण शुरू कर दिया। बस यहीं से बवाल की शुरूआत हुई। सुबह आठ बजे एकाएक माहौल बदल गया। वक्त ने करवट ली और सांप्रदायिकता की आग गांव में धधक उठी। एक समुदाय के लोगों ने दूसरे पर हमला बोल दिया, जिसके वार से पुलिस भी अपने आप को नहीं बचा सकी। नौ बजे तक इस कदर बवालियों ने तांडव मचाया कि देखते ही रोंगटे खड़े हो गए।
दूसरे पक्ष के शायद ही कोई ऐसा घर था जिसमें पथराव न हुआ हो। घर के दरवाजों को तोड़कर अंदर घुसने की दंगाइयों ने पुरजोर कोशिश की। महिलाओं की चीत्कार, बच्चों की पुकार, बवालियों का शोर गांव की गलियों में गूंजता रहा। खुलेआम लहराए गए धारदार हथियारों को देख हरेक शख्स सहमा था। ग्रामीणों की मानें तो अगर वे हाथ आ जाते तो निश्चित तौर पर कत्ल कर दिए जाते। पुलिस के आने पर ही बवालियों में भगदड़ मची।