अमरोहा। 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला की दुष्कर्म के बाद गला दबाकर हत्या करने के अपराध को अदालत ने विरल से विरलतम अपराध की श्रेणी में रखा है। अदालत का मानना है कि दोषी ने ऐसी अवस्था की महिला के साथ वारदात को अंजाम दिया जो अपराध का विरोध करने की अवस्था में भी नहीं थी।
एफटीसी-प्रथम के न्यायाधीश उमेश कुमार द्वितीय ने मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि स्पष्ट है कि घटना कारित करते समय अभियुक्त ने मृतका के ऊपर कोई दया नहीं दिखाई तथा अभियुक्त द्वारा मृतका के साथ न केवल दुष्कर्म किया गया, बल्कि उसने अपने द्वारा किए गए घृणित एवं पाशविक प्रवृत्ति के अपराध को छिपाने के उद्देश्य से बिना कोई पश्चाताप किए सोच-समझकर क्रूर तरीके से मृतका की गला दबाकर उसकी हत्या भी कर दी। यह आपराधिक कृत्य सोच-विचारकर बिना किसी कारण के किया गया। अभियुक्त द्वारा हैवानियत की पराकाष्ठा करते हुए घटना को अंजाम दिया। इस समय न तो मृतका की अवस्था का ध्यान रखा गया न ही अपनी एवं मृतका की अवस्था के अंतर को ध्यान में रखा गया। अभियुक्त और महिला के बीच कोई रंजिश नहीं थी। फिर भी अभियुक्त ने सारी सामाजिक मार्यादाओं का उल्लंघन करते हुए एवं हैवानियत की सीमा पार करते हुए सोच-समझकर अक्षम असक्त एवं वृद्ध का दुष्कर्म कर हत्या करने जैसी क्रूर घटना को अंजाम दिया। तथ्यों एवं परिस्थितियों के प्रकाश में अभियुक्त द्वारा कृत अपराध की गंभीरता बचाव पक्ष के इन तर्कों के आधार पर कम नहीं होती कि - अभियुक्त नवयुवक है, उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और उसका कोई पैरोकार नहीं है।
फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि दंड देते समय न्यायालय को पीड़ित, समाज, राज्य के कानून और अपराधी चारों पर ध्यान देना होता है और अभियुक्त को दी जाने वाली सजा कृत अपराध के समतुल्य होनी चाहिए। प्रकाश में प्रश्नगत मामला विरल से विरलतम की श्रेणी में आता है। इस मामले में अभियुक्त को मृत्युदंड के अलावा अन्य वैकल्पिक दंड दिया जाना कृत अपराध के समतुल्य नहीं होगा। अभियुक्त सहानुभूति का पात्र नहीं है। अभियुक्त उपेंद्र को धारा 302 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत मृत्युदंड की सजा से दंडित किया जाता है। अभियुक्त के गर्दन में फांसी लगाकर तब तक लटकाया जाए जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।
703 दिन की सुनवाई, 8 गवाह, 30 पन्नों में फांसी की सजा
अमरोहा। 703 दिनों की सुनवाई में आठ गवाहों के सहारे अभियोजन पक्ष न्याय की लड़ाई जीत गया। 30 पन्नों में कैद फांसी की सजा पीड़ित किसान को मिले न्याय की गवाही दे रही है। फैसला सुनाते के बाद न्यायाधीश ने आदेश पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद डेथ वारंट जारी किया गया।
मामले में दो चश्मदीदों सहित आठ गवाहों के बयान लिए गए। छानबीन में आरोपी का बनियान घटनास्थल से पाए जाने की बात भी पुलिस ने अपनी चार्जशीट में कही थी। पूरी कानूनी प्रक्रिया में 703 दिन लगे। शासकीय अधिवक्ता चौधरी संजीव कुमार ने बताया कि आरोपी उपेंद्र को फांसी की सजा दिलाने में सईदा और रोहित की गवाही सबसे महत्वपूर्ण मानी गई है। दोनों गवाह चश्मदीद थे।
पांच पन्नों की पुलिस ने दाखिल की थी चार्जशीट
अमरोहा। पुलिस ने विवेचना कर गवाहों के बयान दर्ज किए। पुलिस ने नब्बे दिन के भीतर पोस्टमार्टम रिपोर्ट और घटनास्थल पर मिले साक्ष्य, आरोपी के बनियान के आधार मानते हुए पांच पन्नों की जार्जशीट न्यायालय में दाखिल की थी।
गन्ने के खेत में खींचकर ले जाते और भागते बना आधार
अमरोहा। बुजुर्ग महिला को आरोपी गन्ने के खेत में खींचकर ले गया था। दुष्कर्म और हत्या की वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी उपेंद्र मौके से भाग निकला। ये दोनों घटनाक्रम आरोपी को सजा दिलाने में अहम रहे। सईदा ने उसे बुजुर्ग महिला को खींचते हुए ले जाते देखा था, जबकि रोहित ने उसे भागते हुए देखा था।