अमरोहा। ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों और युवाओं को गांव में ही पढ़ाई व प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बेहतर माहौल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ग्राम पंचायत स्तर पर बनाई गई लाइब्रेरियों की व्यवस्था बदहाल है। लाखों रुपये खर्च करके तैयार की गई इन लाइब्रेरियों में कहीं ताले लटके हैं तो कहीं भवन देखरेख के अभाव में खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। किताबों का अभाव और बैठने की उचित व्यवस्था नहीं होने से ग्रामीण विद्यार्थियों को लाइब्रेरी की सुविधा का लाभ नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में उन्हें पढ़ाई के लिए निजी लाइब्रेरी का सहारा लेना पड़ रहा है और शहर तक की दौड़ लगानी पड़ रही है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जिले में कुल 574 ग्राम पंचायतें हैं। इनमें से केवल 103 ग्राम पंचायतों में लाइब्रेरी संचालित हो रही हैं। ज्यादातर लाइब्रेरियां पंचायत सचिवालयों में बनाई गई हैं, जबकि कुछ स्थानों पर इनके लिए अलग भवन तैयार किए गए हैं।
सोमवार को संवाद न्यूज एजेंसी की टीम ने जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में ग्राम पंचायत स्तर पर संचालित लाइब्रेरियों की पड़ताल की तो कई जगह व्यवस्थाओं की हकीकत सामने आई। कहीं लाइब्रेरी पर ताला लटका मिला तो कहीं भवन में किताबें, मेज-कुर्सी और रोशनी तक की व्यवस्था नहीं मिली। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि लाखों रुपये खर्च कर बनाई गई इन लाइब्रेरियों का उद्देश्य आखिर कैसे पूरा होगा।
पंचायत सचिवालय में लाइब्रेरी, लेकिन दरवाजे पर ताला
गजरौला। ब्लॉक की ग्राम पंचायत मोहरका पट्टी में गंगा तटबंध के किनारे और परिषदीय विद्यालय के निकट भव्य पंचायत सचिवालय बनाया गया है। सचिवालय परिसर में फूल-पौधे भी लगाए गए हैं। इसी भवन में लाइब्रेरी भी स्थापित की गई है। सोमवार दोपहर करीब एक बजे पड़ताल के दौरान लाइब्रेरी के मुख्य दरवाजे पर ताला लटका मिला। ग्राम प्रधान महनाज ने बताया कि सोमवार को ब्लॉक स्तर पर रैली थी। पंचायत सहायक के रैली में जाने के कारण लाइब्रेरी बंद रही होगी। ग्रामीणों का कहना है कि यदि लाइब्रेरी नियमित रूप से नहीं खुलेगी तो इसका उद्देश्य पूरा होना मुश्किल है।
चार साल से खंडहर बना पुस्तकालय भवन
हसनपुर/बुरावली। हसनपुर ब्लॉक के ग्राम देहरा मिलक में ग्राम सचिवालय के भीतर लाइब्रेरी तैयार की गई है। ग्रामीणों के मुताबिक सचिवालय अक्सर बंद रहता है। ऐसे में लाइब्रेरी का ताला भी नहीं खुलता और गांव के छात्र-छात्राओं को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को मजबूरन निजी लाइब्रेरी का सहारा लेना पड़ रहा है। वहीं सहेलिया गांव में लाइब्रेरी का संचालन अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से किया जा रहा है। यहां विद्यार्थी लाइब्रेरी का उपयोग कर रहे हैं। इसके विपरीत बुरावली में पंचायत सचिवालय के पास बनाया गया पुस्तकालय भवन पिछले करीब चार वर्षों से बदहाल पड़ा है। भवन में न किताबें हैं, न बिजली की व्यवस्था और न ही छात्र-छात्राओं के बैठने के लिए टेबल-कुर्सियां। हालत यह है कि ग्रामीण भवन की छत का इस्तेमाल लकड़ियां रखने के लिए कर रहे हैं। गांव के विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए करीब दो किलोमीटर दूर मटीपुरा की लाइब्रेरी जाना पड़ रहा है।
कई गांवों में लाइब्रेरी तक नहीं
ग्रामीण क्षेत्रों में लाइब्रेरी की उपलब्धता भी समान नहीं है। बांसका कला, बांसका खुर्द और मदारीपुर समेत कई गांवों में लाइब्रेरी नहीं होने के कारण विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए दूसरे गांवों या शहरों का रुख करना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि गांव में बनी लाइब्रेरियों को नियमित रूप से खोला जाए और उनमें पर्याप्त किताबें, फर्नीचर, बिजली व इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध कराई जाए तो विद्यार्थियों को काफी राहत मिल सकती है।
गांव में सुविधा के नाम पर खानापूर्ति, शहर में पढ़ाई के लिए जेब हो रही ढीली
गांव में सरकारी लाइब्रेरी होने के बावजूद उसके बंद रहने या सुविधाएं नहीं होने से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं और छात्र-छात्राओं को निजी लाइब्रेरी का सहारा लेना पड़ रहा है। ग्रामीण विद्यार्थियों का कहना है कि निजी लाइब्रेरी की फीस के अलावा आने-जाने में भी खर्च होता है। यदि पंचायत स्तर की लाइब्रेरियां नियमित रूप से संचालित हों तो उन्हें घर के नजदीक ही पढ़ाई का बेहतर माहौल मिल सकता है।
जिन ग्राम पंचायतों में लाइब्रेरी में ताले लगे हैं। उनको दिखवाया जाएगा। लाइब्रेरी बच्चों के पढ़ने के लिए बनाई गई हैं। अगर कहीं पर बंद है तो संबंधित ग्राम पंचायत अधिकारियों से जानकारी की जाएगी।
-नितिन कुमार, डीपीआरओ