अमेठी। एक ओर जहां कमरतोड़ महंगाई ने आम आदमी का बजट पूरी तरह से बिगाड़ दिया है, वहीं अब निजी स्कूलों में फीस के साथ किताबों के दाम बढ़ने से अभिभावक परेशान हो उठे हैं। दाखिला कराने व पढ़ाई की फीस जमा करने को लेकर अभिभावकों को कर्ज का सहारा लेना पड़ रहा है। इन सब के बावजूद भी शासन व शिक्षा विभाग निजी स्कूलों द्वारा की जा रही मनमानी पर कोई अंकुश नहीं लग पा रहा है।
डीजल, पेट्रोल, रसोई गैस, खाद्य पदार्थों के साथ ही अन्य सामानों में बेतहाशा महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। महंगाई के चलते जहां एक ओर परिवार का भरण पोषण मुश्किल हो गया है वहीं अब बच्चों को नामी-गिरामी एवं अन्य विद्यालयों में अच्छी शिक्षा दिलाना सपना लगने लगा है। गौरतलब है कि अप्रैल माह से नए सत्र का प्रारंभ हो गया है।
प्राइवेट स्कूल संचालकों द्वारा भारी भरकम शुल्क एडमिशन व रिएडमिशन के नाम पर वसूला जा रहा है। किताबों के दाम में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। स्कूलों में किसी न किसी मद के नाम पर अभिभावकों से पैसा वसूला जाता है। प्राइवेट स्कूलों द्वारा प्रति वर्ष किताबों में बदलाव किया जाना अभिभावकों के बजट को और बिगाड़ देता है। जिले में स्थित नामी गिरामी निजी स्कूल पूरी तरह मनमानी पर आमादा हैं।
एडमिशन फीस के साथ डोनेशन में बिल्डिंग, बिजली, पानी, पंखा, ड्रेस, किताब व जनरेटर के नाम पर अभिभावकों की जेब काट रहे हैं। हाई-फाई स्कूलों में एडमिशन फीस जहां पांच से दस हजार रुपये तो कम सुविधा संपन्न स्कूलों में तीन से पांच हजार रुपये तक है। इसके बाद हर माह फीस व अन्य कार्यक्रमों का शुल्क अलग है।
निजी स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबों की जगह कमीशन एवं अधिक मुनाफा कमाने की नियत से निजी प्रकाशकों की पुस्तकें खरीदने को बाध्य किया जा रहा है। बढ़ी महंगाई के चलते इस बार स्टेशनरी एवं किताबों के मूल्यों पर करीब पंद्रह से बीस फीसदी का इजाफा हुआ है। ऐसे में अभिभावक बच्चों की एडमिशन फीस व किताबें, ड्रेस आदि खरीदने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हैं। शासन एवं शिक्षा विभाग इस पर अंकुश लगाने में पूरी तरह अक्षम दिखाई दे रहा है।
फिक्स दुकानों पर कराते खरीद
निजी एवं कॉन्वेंट स्कूलों द्वारा कक्षावार किताबों आदि का पैकेज तय किया जाता है। कक्षा एक से पांच तक की किताबों एवं स्टेशनरी का पैकेज करीब तीन से पांच हजार तो छह से आठ तक की किताबों एवं स्टेशनरी का पैकेज आठ हजार रुपये तक पहुंच रहा है। कई नामी स्कूलों में यह दस हजार रुपये तक पहुंच जाता है। आलम यह है कि निजी विद्यालयों द्वारा ड्रेस जूते एवं अन्य सामान के लिए भी दुकानें फिक्स होती हैं। जहां किताबों के साथ ही ड्रेस आदि में भी इनका भारी भरकम कमीशन होता है। अभिभावकों को निजी विद्यालयों में पढ़ाना है तो मजबूरन उनके द्वारा दी गई सूची के अनुसार ही किताबों व अन्य सामानों की खरीदारी करनी पड़ रही है।
दुकानदारों ने बताया...
किताब व्यवसायी भोलानाथ शुक्ल, ज्ञानेश रस्तोगी, सोनू पांडेय ने बताया कि स्टेशनरी और कागज के मूल्य में भारी वृद्धि हुई है। स्टेशनरी और किताबों के दाम में करीब 15 से 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने बताया कि अभी किताबों की उपलब्धता मात्र 50 फीसदी ही दुकानों पर उपलब्ध है। छपाई व अन्य कारणों से सभी किताबें दुकानों पर नहीं उपलब्ध हो पाई है। किताबों एवं स्टेशनरी आदि के दाम बढ़ने से समस्याएं बढ़ी हैं।
अभिभावकों का दर्द
राघवेंद्र तिवारी ने बताया कि अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना अब आसान नहीं है। कोरोना संक्रमण से ऑनलाइन शिक्षा में भी अभिभावक दो साल से परेशान रहे। एडमिशन फीस और किताबों के बढ़े दाम ने पूरा बजट बिगाड़ दिया है। किताबों स्टेशनरी एवं किताबों के दाम में जहां बढ़ोतरी हुई है वहीं एडमिशन फीस और अन्य का शुल्क भी स्कूलों द्वारा बढ़ा दिया गया है। विजय बहादुर सिंह ने बताया कि निजी स्कूलों की पढ़ाई काफी महंगी हो गई है। एडमिशन फीस, किताबों के दाम आसमान छू रहे हैं। एक और जहां महंगाई के चलते घर चलाना मुश्किल हो गया है वहीं अब बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पाना हर अभिभावक के बस की बात नहीं है।
प्रशासन को इस पर अंकुश लगाना चाहिए जिससे आम आदमी के बच्चे अच्छी शिक्षा पा सके। आशीष पाठक ने बताया कि प्राइवेट स्कूल में बच्चों का एडमिशन कराया है। एनसीईआरटी किताबों के अलावा प्राइवेट किताबें विद्यालय द्वारा लगाई गई हैं। उन्होंने बताया कि एडमिशन फीस के अलावा किताब व ड्रेस आदि का मिलाकर करीब दस हजार रुपये से ज्यादा एक बच्चे का खर्च आ रहा है। पंकज श्रीवास्तव ने बताया कि कि निजी विद्यालयों में एडमिशन फीस के अलावा स्टेशनरी, किताबों सहित अन्य सामग्री के दाम काफी बढ़े हैं, ऐसे में आम आदमी अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाने के लिए परेशानी उठानी पड़ रही है। कहा कि शासन की ओर से सरकारी विद्यालयों की तरह निजी विद्यालयों के लिए भी नियम बनाया जाना चाहिए।