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आजादी के 75 साल बाद भी नहीं हुई चकबंदी

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सिंहपुर (अमेठी)। आजादी के 75 वर्ष बाद भी कुकहा रामपुर व टिकरी गांव में कभी चकबंदी नहीं हुई। चकबंदी नहीं होने से दोनों ग्राम पंचायतों के मुख्य राजस्व अभिलेख बंदोबस्त व बंदोबस्ती नक्शा उर्दू में है। इन अभिलेखों को तहसील में तैनात कोई भी राजस्वकर्मी पढ़ नहीं सकता। आवश्यकता पड़ने पर राजस्व लेखपाल उसे पढ़कर अनुवाद कराने के लिए मौलवी खोजता है। मौलवी ने सही से पढ़ लिया तो ठीक अन्यथा लेखपाल की कार्रवाई भगवान भरोसे रहती है।
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चकबंदी न होने के चलते बड़ी संख्या में ऐसे किसान हैं कि उनकी जमीन कहीं और है, कब्जा कहीं और है। कोई किसान गर अपने खेत की हदबंदी करा लेता है तो वह किसान जो अपनी जमीन के अलावा दूसरे की जमीन पर खेती कर रहा था वह अपना खेत ढूंढ़ने के लिए लेखपाल व तहसील तथा वकीलों के चक्कर लगाता रहता है। इन गांवों में बड़ी संख्या में ऐसे किसान हैं, जिनके दादा परदादा काश्तकार थे, परंतु अभिलेख न पढ़ पाने के चलते राजस्व लेखपालों ने वरासत नहीं की और वह खाते मतरूफ हो गए।
चकबंदी नहीं होने के चलते बहुत सारी आबादी ऐसी बसी है, जो खेतों में है या सुरक्षित वन भूमि या पट्टेदारों के नाम दर्ज जमीन में। टिकरी और कुकहा रामपुर ग्राम पंचायतों के मुख्य राजस्व अभिलेख उर्दू में होने के चलते किसानों की परेशानी तब और बढ़ जाती है जब कोई कार्य बंदोबस्त व बंदोबस्ती नक्शे से संबंधित पड़ जाता है। लेखपाल व राजस्व निरीक्षक उसे पढ़ नहीं पाता और उसे अनुवाद के लिए किसानों को अच्छी खासी फीस भी देनी पड़ती है।
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लगभग 40 वर्ष पूर्व सिंचाई विभाग और राजस्व विभाग ने संयुक्त प्रयास से नक्शे का हिंदी में रूपांतरण कराया। बावजूद इसके इसमें बड़ी संख्या में गड़बड़ियां हैं। यही गड़बड़ियां किसानों के शोषण का कारण बनी हुई हैं। आवश्यकता पड़ने पर किसान राजस्व कर्मियों व तहसील के चक्कर लगाते रहते हैं।
ग्राम पंचायत का मुख्य राजस्व अभिलेख बंदोबस्त व नक्शा माना जाता है। इन्हीं अभिलेखों के आधार पर ग्राम पंचायत की पूरी राजस्व कार्यवाही की जाती है। अब ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन गांवों में कैसे राजस्व के कार्य चल रहे होंगे। चकबंदी नहीं होने के चलते सैकड़ों बीघे वन भूमि व किसानों/ पट्टेदारों की भूमि पर आबादी बस गई है। किसान अपनी भूमि पाने नपवाने के लिए तहसील के चक्कर लगा रहे हैं।
टिकरी निवासी रामराज रावत का कहना है कि जहां हम लोग पुश्तैनी खेती करते थे, वह किसी और के नाम बताई जाती है। हम लोग सोच रहे थे चकबंदी होगी सब सही हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। इसी गांव के रामकिशोर का कहना है कि खेतों की नालियां, चकरोड कुछ भी नहीं है। खेतों को जाना है तो दूसरे के खेत से ही जाना है।
पूरे कुम्हार निवासी रामबालक का कहना है कि नकल लेनी हो तो पहले एक मौलवी ढूंढना पड़ता है, जो उसे उर्दू में पढ़ सके। राम सुमिरन प्रजापति का कहना है कि गांव में बहुत जमीन किसानों को पट्टे में मिली है, परन्तु उन पट्टों पर कब्जा कर पाना आसान नहीं है।
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