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12 साल पुराने जिले में नहीं एक भी ब्लड बैंक

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गौरीगंज (अमेठी)। लंबे समय से वीवीआईपी माने जाने वाले जिले के रूप में चर्चित अमेठी के 25 लाख लोगों को अब तक ब्लड बैंक की सुविधा नहीं मिल सकी है। जिला गठन के 11 वर्ष बाद संचालित संयुक्त जिला अस्पताल में भी अब तक अदद ब्लड बैंक की स्थापना नहीं हो सकी। यह स्थिति तब है जब जिला अस्पताल में ब्लड बैंक की एक विंग सुरक्षित पड़ी है।
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विभागीय लापरवाही का आलम यह है कि करीब एक वर्ष से ज्यादा समय से संयुक्त जिला अस्पताल का संचालन नए भवन में हो रहा है। उक्त नए भवन में ब्लड बैंक संचालन के लिए निर्मित एक विंग आज भी धूल फांक रही है। निदेशालय स्तर से ब्लड बैंक संचालन के लिए संसाधनों की खरीद नहीं होने से अब तक कोई प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है। ब्लड बैंक संचालन के लिए कुल 25 प्रकार के संसाधन/ उपकरण की जरूरत होती है।
इसके लिए जनपद स्तर से लगातार पत्राचार किया जा रहा है। बावजूद इसके अब तक उपकरण मुहैया कराने वाले उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कॉरपोरेशन द्वारा 25 में से छह उपकरणों की ही आपूर्ति की गई है। ऐसे में अब तक जिला अस्पताल में ब्लड बैंक संचालन के लिए आवेदन तक नहीं किया जा सका है। नया जिला होने के चलते पूरे जिले में कहीं भी ब्लड बैंक की व्यवस्था नहीं है।
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ऐसे में जरूरतमंदों को आवश्यकता पड़ने पर पड़ोसी जनपद सुलतानुपर, प्रतापगढ़ व रायबरेली का चक्कर लगाना पड़ाना है। ऐसे में कभी कभार गंभीर मरीजों की समय पर रक्त नहीं मिल पाने से जान भी चली जाती है।
सीएमएस डॉ. बद्री प्रसाद अग्रवाल ने बताया कि ब्लड बैंक यूनिट तब पूर्ण होती है, जब वहां पर ब्लड कंपोनेंट सेपरेशन यूनिट (रक्त पृथक्करण इकाई) पूरी तरह से संचालित हो। यहां पर एक यूनिट खून से तीन मरीज की जान बचाई जा सकती है। कहा कि यहां खून से लाल रक्त कणिका, प्लाजमा व प्लेटलेट को अलग किया जाता है। कुछ मरीजों को सिर्फ खून की जरूरत होती है उन्हें लाल रक्त कणिका का खून चढ़ाया जाता है।
कुछ को सिर्फ प्लेटलेट्स की ही जरूरत होती है। बर्न आदि के मरीजों को प्लाज्मा की जरूरत होती है। इस तरह से एक यूनिट ब्लड से अलग-अलग तीन मरीजों की आवश्यकता पूरी होती है। सभी उपकरणों की आपूर्ति मिलने तथा लाइसेंस जारी होने के बाद जिला अस्पताल के ब्लड बैंक पर इन तीनों की उपलब्धता रहेगी।
सीएमएस ने बताया कि ब्लड बैंक यूनिट पर संबंधित 25 प्रकार के उपकरणों की उपलब्धता होने के बाद लाइसेंस जारी करने वाली इकाई एड्स कंट्रोल सोसाइटी में आवेदन किया जाता है। आवेदन में पैथालॉजिस्ट डॉक्टर का लाइसेंस लगाना अनिवार्य होता है। आवेदन करने के बाद निदेशालय व सोसाइटी मिलकर लाइसेंस जारी करेगी। इसके बाद ही संचालन किया जा सकता है।
कहा कि अभी जब उनके पास कोई उपकरण ही नहीं हैं तो आवेदन करने का कोई मतलब ही नहीं है। फिलहाल पत्राचार किया जा रहा है। सभी उपकरणों की आपूर्ति करने के बाद आवदेन किया जाएगा।
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