फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अपने कर्म से गढ़ा सम्मान का प्रतिमान

विज्ञापन
विज्ञापन
भेटुआ (अमेठी)। नारी तेरे रूप अनेक की कहावत को चरितार्थ कर रहीं महिलाएं कहीं प्रेम व वात्सल्य की प्रतिमूर्ति बनी हैं तो कहीं मजबूरी में परिवार की उन्नति के लिए घर की ड्योढ़ी लांघ कर समूचे क्षेत्र के लिए प्रेरणास्रोत। अपने साहस व कर्म के बल पर महिलाओं ने न सिर्फ अपने व परिवार के सम्मान को नया प्रतिमान दिया है बल्कि समाज की प्रगति में भी भागीदारी निभाई है। पेश है क्षेत्र की कुछ ऐसी महिलाओं की कहानी जो दूसरों के लिए एक नजीर बन गईं...
विज्ञापन

प्रिंसी हमारे घर की राजकुमारी
लगभग एक दशक पहले सुल्तानपुर अमेठी मार्ग पर टिकरी गांव के पास चिलचिलाती धूप में चरवाहों ने एक नवजात बालिका को लाल लाल चींटियों से घिरा देखा था। यह बात कुछ ही देर में जंगल की आग की तरह फैल गई। कुछ ने पुलिस बुलाने की बात की तो कुछ ने ग्राम प्रधान को। कुछ ऐसे भी थे जो किनारा काट गये। हालांकि उसी झुंड में पहले से खड़ी तीन बच्चों की मां उर्मिला (निवासी टिकरी) दया और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति बनकर खड़ी हो गईं। बिटिया को चींटियों के आवरण से हटा अपने कलेजे से चिपका लिया। यही नहीं अपने घर लाकर बिटिया का नाम प्रिंसी रखा। उसे फूल की तरह पाला। आज वह बिटिया 11 साल की हो रही है और कक्षा पांच की छात्रा है। प्रिंसी उर्मिला को मां व गंगा प्रसाद प्रजापति को पिता कहकर बुलाती है। उर्मिला कहती हैं कि प्रिंसी हमारे घर की राजकुमारी है। इससे ही हमारे घर की रौनक है। उर्मिला के इस कदम की चर्चा 11 साल बाद भी पूरे क्षेत्र में होती है।
ड्योढ़ी लांघ हजारों घरों में फैलाई रोशनी
टिकरी गांव की रेखा यादव की कहानी भी कुछ ऐसी है कि जिसे सुनकर निराशा और हताशा कोसों दूर भाग जाए। इनके मुताबिक साल 2008 में जब परिवार का बंटवारा हुआ तो इनके ऊपर एक साथ छह अबोध बच्चों का भार अचानक आ पड़ा। घर की जिम्मेदारी के साथ बच्चों की पढ़ाई, लिखाई और साथ में खेती बारी। पति ट्रक चलाकर परिवार का भरण पोषण करते थे। इन्होंने बताया कि महीनों तक पति बाहर ही रहते थे। ऐसे में मजबूरन घर की ड्योढ़ी लांघना पड़ा। कुछ और भी बेहतर करने की सोच लेकर रेखा मोहल्ले में ही चल रहे एक समूह में जुड़ीं। कुछ ही समय में समूह की महिलाओं के बीच इन्हें अध्यक्ष चुन लिया गया। समय बीतने के साथ रेखा का साहस भी बढ़ा। आज रेखा की मेहनत से स्वयं सहायता समूहों की श्रंखला खड़ी हो गई है। रेखा ने गांव की महिलाओं को बैंक से सीसीएल कराकर उन्हें विविध लाभकारी योजनाओं से जोड़ा। इन्होंने बताया कि वर्तमान समय में आजीविका मिशन से व मनरेगा से भी समूह की महिलाओं को जोड़ा जा रहा है। वर्तमान में रेखा यादव समूहों की ब्लॉक अध्यक्ष हैं। इनके नेतृत्व में आज 476 समूह संचालित हैं। आज क्षेत्र में कोई समूह का नाम लेता है तो रेखा का नाम सबसे पहले आ जाता है। हजारों परिवारों में रोशनी फैलाने वाली रेखा बताती हैं कि शुरू में समाज में हमें बहुत बातों को सहन करना पड़ा। लेकिन हमने उन्हें दरकिनार कर दिया। कहती हैं कि आज महिलाओं में जिस कदर जागरूकता बढ़ रही है इससे लगता है कि समाज नई दिशा की ओर बढ़ रहा है।
विज्ञापन

पूनम में भी गजब की जिजीविषा
टिकावर गांव की पूनम बाला सिंह बताती हैं कि साल 2006 में वे समाज में अपनी भागीदारी निभाने की सोच लेकर घर से बाहर निकलीं। पहले वे गांव के एक स्कूल में तीन साल तो दूसरे में छह साल अध्यापन किया। मैं गांव की पहली बहू थी जिसने घर से निकलकर काम शुरू किया। हमें देखकर अन्य महिलाओं में भी जागरूकता आई। आज पूनम अपने परिवार की जिम्मेदारी को निभाने के साथ ही बैंक की बीसी सखी व एलआईसी अभिकर्ता के रूप में कार्य करते हुए समाज के लिए मिसाल बनी हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें