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आज की पीढ़ी हुड़दंग को समझती होली का पर्व

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आलापुर। प्रेम और सौहार्द का त्यौहार होली अब बस एक रस्म निभाने जैसा रह गया है। होली में त्यौहारों का रंग तो खूब दिख रहा, पर उसमें हमारी परंपरायें कहीं न कहीं विलुप्त होती जा रही हैं। आधुनिकता की भागम-भाग में अब न तो वह माहौल रहा और न ही वह लोग जो कभी फागुन के चढ़ते ही होलिया माहौल में आ जाते। बसंत पंचमी के बाद होलिका के लिए वैदिक परंपरा से चौराहों पर लगाई जाने वाली अरंड की डाल भी अब जैसे तैसे रस्म पूरी कर लगा दी जाती है।
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होलिका दहन के लिए लकड़ी आदि इकट्ठा तो की जाती है, लेकिन पहले जैसी बात अब नहीं दिखती। फाल्गुन के महीने में गांव, चौपाल गाया जाने द्वारा गाया जाने वाला फगुआ गीत और जोगीरा भी कोई नहीं गाता। युवा वर्ग डीजे की धुन पर नृत्य करने को ही होली का धमाल समझता है। रन्नापुर गांव निवासी हरिनाथ पासवान बताते हैं कि अब होली में वह प्रेम कहां जो हम लोगों के जमाने में होता था।
आज का युवा वर्ग तो हुड़दंग को ही होली समझता है। गुड़ का रस और भुने चने के स्वाद के साथ ही होली के अवसर पर परदेस से आने वाले लोग दरवाजे पर होने वाले कार्यक्रम में भांग की ठंडई बनवाते थे। ढोलक और मंजीरे की धुन पर देर रात तक फगुआ चलता था। नीबा निवासी मंत्री ने बताया कि हमारे जमाने की होली के रंगों में प्रेम का रंग गहरा दिखायी देता था। तिलकटंडा निवासी रामबूझ भी विलुप्त होती परंपरा से मायूस नजर आते हैं।
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