अंबेडकरनगर। एक जनपद एक उत्पाद के तहत चयनित कपड़ा उद्योग जिले में दम तोड़ रहा है। महंगी बिजली व बढ़ते धागों के दाम से पावरलूम हांफ रहे हैं। लगातार कम हो रही आय का नतीजा है कि बीते तीन वर्ष में लगभग दो हजार पावरलूम या तो बंद हो गए, या फिर बिक गए। ऐसे में बुनकर अब इस उद्योग को छोड़कर दूसरे काम पर ध्यान देने लगे हैं।
कपड़ा उद्योग के लिए अंबेडकरनगर की अलग ही पहचान है। टांडा के बने टेरीकाॅट, गमछा, लुंगी व अराफाती रुमाल महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, बिहार, पश्चिम बंगाल समेत दो अन्य राज्यों में बिक्री के लिए जाते हैं। इसी को देखते हुए अंबेडकरनगर का चयन एक जनपद एक उद्योग में कपड़ा उद्योग के लिए किया गया। इससे बुनकरों को उम्मीद बंधी थी कि कपड़ा उद्योग को पंख लगेगा, लेकिन ऐसा होता नजर नहीं आ रहा।
उत्तर प्रदेश बुनकर सभा के प्रदेश अध्यक्ष हाजी इफ्तेखार अहमद कहते हैं कि जिले में लगभग सवा लाख पावरलूम हैं। इसमें सबसे अधिक टांडा व जलालपुर तहसील क्षेत्र में हैं। बीते कुछ वर्ष से कपड़ा उद्योग को झटका लगा है। कहा कि पूर्व में जहां दो पावरलूम पर 146 रुपये बिजली बिल आता था, तो वहीं बिजली महंगी होने के चलते अब सिर्फ एक पावरलूम का 700 रुपये बिल आता है। इसी का नतीजा है कि बीते तीन वर्ष में लगभग दो हजार पावरलूम या तो बंद हो गए या फिर बिक गए।
ऑल इंडिया बुनकर फेडरेशन के अध्यक्ष नदीम अंसारी ने कहा कि जो उत्पाद होता है, उसकी बिक्री को लेकर जिले में कोई विशेष व्यवस्था नहीं है। इसके लिए अलग से बाजार भी नहीं है। जीएसटी के चलते धागा महंगा मिलता है। इससे तैयार किए जाने वाले कपड़ों पर लागत अधिक आती है, लेकिन उसके अनुसार लाभ नहीं मिल रहा। इसी के चलते कपड़ा उद्योग गति नहीं पकड़ रहा है। मालूम हो कि टांडा व जलालपुर के अलावा जहांगीरगंज, अकबरपुर, बसखारी, किछौछा, इल्तिफातगंज, हंसवर समेत कई अन्य क्षेत्रों में पावरलूम संचालित हैं।(संवाद)
मजदूरी देना हो रहा मुश्किल
बुनकर नेता हाजी इफ्तेखार अहमद ने कहा कि महंगी बिजली व महंगा धागा होने से अब मजदूरी निकालना मुश्किल हो रहा है। कहा कि तमिलनाडु से ज्यादातर धागा आता है। टांडा तक पहुंचते-पहुंचते वह महंगा हो जाता है। इससे तैयार किए जाने वाले कपड़े के दाम में वृद्धि नहीं हो रही। दरअसल टांडा व अन्य क्षेत्र में तैयार किए जाते हैं, अब तमिलनाडु से भी उसी प्रकार के कपड़े जिले में लाकर बेचे जा रहे हैं। चूंकि वहां धागा सस्ता है, इसलिए तैयार कपड़े के भी दाम कम हैं। इसके चलते मजदूरों की मजदूरी में भी कमीं हो रही। इससे मजदूर अब पावरलूम पर काम करने के बजाय अन्य काम की तरफ रुख कर रहे हैं।