फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दो बार सपा ने काटा था टिकट, सुभाष ने चुकता किया हिसाब

विज्ञापन
विज्ञापन
अंबेडकरनगर। दो विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी घोषित होने के बाद जिन सुभाष राय को टिकट काट दिए जाने का सामना करना पड़ा था, उन्होंने समाजवादी पार्टी से अपना हिसाब चुकता कर लिया। सुभाष को सपा ने जलालपुर से वर्ष 2012 व 2017 में प्रत्याशी घोषित किया, लेकिन ऐन मौके पर टिकट बदलकर दूसरों को थमा दिया। उस दौरान भी सुभाष खासे आहत हुए थे, लेकिन तब धैर्य बनाए रहे। परिणाम यह हुआ कि 2019 में हुए उप चुनाव में उन्हें सपा ने टिकट थमाया और वे विधायक निर्वाचित होने में सफल रहे। हालांकि भाजपा से ही अपने राजनीतिक कॅरियर की शुरुआत करने वाले सुभाष ने लगभग दो दशक बाद विधानसभा चुनाव के ऐन मौके पर सपा को सबक सिखाते हुए घर वापसी कर ली।
विज्ञापन

पंचायत चुनाव की राजनीति के पक्के खिलाड़ी के तौर पर शुरुआती दौर में उभरे सुभाष राय को समाजवादी पार्टी ने जिस तरह से दो चुनाव में झटका दिया था, उन्होंने ठीक उसी तर्ज पर अब सपा को करारा जवाब दिया है। सुभाष ने अपने कॅरियर की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी से की थी। वे भाजपा के समर्थन से वर्ष 1995 व 2000 में जिला पंचायत सदस्य निर्वाचित हुए थे। वर्ष 2002 में वे भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए। 2005 में वे न सिर्फ स्वयं जिला पंचायत सदस्य चुने गए, वरन अपने भाई श्रीकांत राय को भी जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जितवाने में कामयाब रहे।
2010 में सुभाष राय फिर से जिला पंचायत सदस्य निर्वाचित होने में सफल रहे। सुभाष राय का कद तब तक इतना बढ़ चुका था कि उन्होंने समाजवादी पार्टी से 2012 के विधानसभा चुनाव में टिकट मांगा। वे 2008 में सपा में शामिल होकर पार्टी के लिए काम कर रहे थे। उनके योगदान को देखते हुए सपा ने टिकट घोषित किया, लेकिन ऐन मौके पर उनका टिकट काटकर सपा में शामिल हुए तत्कालीन विधायक शेरबहादुर सिंह को टिकट दे दिया। सुभाष ने हिम्मत नहीं हारी। वर्ष 2017 में उन्होंने फिर दावेदारी जताई। पार्टी ने दोबारा उन्हें टिकट थमाया। हालांकि चुनाव से कुछ दिन पहले ही शंखलाल मांझी को सपा का प्रत्याशी बना दिया गया। इस बार टिकट कटने पर सुभाष समेत समर्थकों को निराशा हुई, लेकिन तमाम उहापोह के बाद भी उन्होंने धैर्य बनाए रखा।
विज्ञापन

सपा ने इसका लाभ भी दिया। वर्ष 2019 में उपचुनाव में उन्हें फिर से प्रत्याशी बनाते हुए अंत तक बरकरार रखा गया। इसमें वे विधायक बनने में कामयाब रहे। सुभाष मौजूदा विधानसभा चुनाव में भी टिकट के प्रबल दावेदार थे, लेकिन बसपा से सपा में आए पूर्व सांसद राकेश पांडेय को टिकट थमाए जाने से वे असंतुष्ट चल रहे थे। नतीजा यह हुआ कि दो विधानसभा चुनाव में जिस समाजवादी पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी घोषित करने के बाद टिकट काट दिया था, उसी पार्टी को उन्होंने टिकट घोषित होने से ऐन पहले ही अलविदा कहते हुए हिसाब चुका कर लिया। इसके बाद लगभग दो दशक के लंबे अंतराल पर सुभाष ने फिर से भाजपा में अपनी घर वापसी कर ली।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें