फोटो 16, अंबेडकरनगर के बैरमपुर में दीप पर्व के मद्देनजर मिट्टी के दीए तैयार करता कुम्हार।
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अंबेडकरनगर। रंग-बिरंगी झालरों की चकाचौंध के बीच मिट्टी के दीये अपनी उपस्थिति बनाए हैं। जिला मुख्यालय से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी के दीयों की खरीदारी हो रही है। खास बात यह है कि बीते वर्षों की तुलना में इस बार मिट्टी के दीयों की मांग अधिक होने से कुम्हारों के चेहरे खिल उठे हैं। साथ ही मिट्टी के खिलौने भी बच्चों के बीच आकर्षक का केंद्र बने हुए हैं।
लगातार हाईटेक होते माहौल के बीच एक तरफ जहां रंगबिरंगी झालरें चारों तरफ रोशनी फैलाती हैं तो वहीं इनके बीच मिट्टी के दीये भी अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। बीते वर्षों में जहां महज औपचारिकता के तौर पर ही मिट्टी के दीयों की खरीदारी लोग करते थे, लेकिन इस बार लोगों का रुझान मिट्टी के दीयों की तरफ बढ़ा है। जिला मुख्यालय से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में ठेलों पर मिट्टी के दीयों से भरे झाबे रखकर उनकी बिक्री का सिलसिला तेज हो गया है। लोग बढ़-चढ़कर इनकी खरीदारी भी कर रहे है। मिट्टी के दीयों की तरफ लोगों के बढ़ते रुझान व उनकी हो रही जबरदस्त खरीदारी से कुम्हारों के चेहरे पर चमक आ गई है। विभिन्न प्रकार की आर्थिकतंगी से जूझ रहे कुम्हारों का कहना है कि जिस प्रकार से मिट्टी के दीयों की मांग इस दीप पर्व पर बढ़ी है, उसे देखते हुए इसके निर्माण का कार्य तेज कर दिया गया है।
सोमवार को अकबरपुर नगर के मीरानपुर में मिट्टी के दीयों को ठेले पर रखकर बिक्री करते हुए मिले मिर्जापुर निवासी रग्घू ने कहा कि बीते वर्षों की तुलना में इस बार मिट्टी के दीयों की मांग अधिक है। कहा कि बीते वर्षों में हुई बिक्री को देखते हुए ही इस बार भी सीमित संख्या में मिट्टी के छोटे-बड़े दीये बनाए थे, लेकिन जिस प्रकार से दीयों की मांग बढ़ी है, उसे देखते हुए दीयों का निर्माण लगातार जारी है। बैरमपुर निवासी संजय ने कहा कि रोशनी के रूप में मनाए जाने वाले दीप पर्व पर मिट्टी के दीयों व खिलौने की बिक्री में तेजी आई है। कहा कि 70 रुपये सैकड़ा की दर से दीये की बिक्री की जा रही है।
इसके अलावा घंटी पांच रुपये, जांता पांच रुपये, चूल्हा 10 रुपये, चक्की आठ रुपये, भोपू 10 रुपये, कुल्हड़ तीन रुपये, सिल-बट्टा पांच रुपये व कोसा तीन रुपये में बेचा जा रहा है। कहा कि आधुनिकता के इस दौर में भी मिट्टी के खिलौने बच्चों के बीच आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। लोरपुर ताजन निवासी अनुराग ने कहा कि पहले उनके पिता मिट्टी के दीयों व खिलौने के निर्माण करते थे। दो वर्ष उनका निधन हो गया था। इसके बाद से यह जिम्मेदारी उसने संभाल ली है। कहा कि रंग-बिरंगी झालरों के बीच लोगों में अभी भी मिट्टी के दीयों का अस्तित्व बना हुआ है।