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बसपा की अंतर्कलह साधू के लिए बनी वरदान

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अंबेडकरनगर। बसपा में पंचायत चुनाव को लेकर मची अंतर्कलह ही बसपा के बागी साधू वर्मा के लिए वरदान बन गई। इसके चलते ही साधू अचानक अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल हो गए। दरअसल यदि बसपा में कलह न होती तो पूर्व मंत्री लालजी वर्मा की पत्नी शोभावती सदस्य पद का चुनाव लड़तीं और फिर से अध्यक्ष बनने की दौड़ में शामिल होतीं। तब साधू का नंबर न आ पाता और जिला पंचायत अध्यक्ष पद का परिणाम भी अलग तस्वीर लेकर आ सकता था।
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राजनीति में समय और परिस्थिति बदलते देर नहीं लगती। यह सच नए जिला पंचायत अध्यक्ष साधू वर्मा पर पूरी तरह फिट बैठा है। दरअसल पंचायत चुनाव की तैयारी शुरू होने पर जब सपा या भाजपा की तरफ से कोई नाम चर्चा में नहीं था तो पूर्व मंत्री लालजी वर्मा की पत्नी शोभावती को अध्यक्ष पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। एक बार अध्यक्ष रह चुकीं शोभावती ने सदस्य पद का चुनाव लड़ने की घोषणा भी कर दी। वे तैयारी में जुट गईं। अध्यक्ष पद पर कब्जा करने में कोई चूक न हो, इसलिए वे अपने हिसाब से सदस्य पद का टिकट जगह-जगह चाह रही थीं।
हालांकि बसपा की अंदरूनी कलह ने ऐसा होने नहीं दिया। कलह इतनी ज्यादा थी कि लालजी वर्मा के अत्यंत खास साधू को सदस्य पद का टिकट देने से इंकार कर दिया गया, जबकि वे पिछली बार बसपा से ही जीत कर आए थे। साधू समेत अन्य समर्थकों को टिकट न मिलने से नाराज होकर शोभावती ने सदस्य पद का चुनाव ही लड़ने से इन्कार कर दिया। हालांकि बसपा ने सिर्फ उन्हें सदस्य पद का टिकट घोषित कर दिया था। शोभावती के इन्कार ने जिला पंचायत चुनाव की तैयारियों और समीकरण में ही उलटफेर कर दिया।
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बस यहीं से साधू वर्मा के लिए रास्ते खुल गए। उन्होंने बसपा में रहते हुए टांडा पूर्वी उत्तरी से बसपा प्रत्याशी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ा और रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल कर ली। सदस्यों का चुनाव संपन्न हुआ तो 41 सीट में बीजेपी सिर्फ 2 जीत पाई। उसे मजबूत प्रत्याशी की तलाश थी। साधू के निर्दलीय होने का फायदा हुआ। बीजेपी नेताओं ने उनसे संपर्क साधा। वे बीजेपी में शामिल हो गए।
इसी बीच बसपा के अंतर्कलह ने साधू की राह और भी आसान कर दी। पूर्व मंत्री कटेहरी विधायक लालजी वर्मा और पूर्व राष्ट्रीय महासचिव राम अचल राजभर को पार्टी ने बाहर कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि बसपा जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में उतरने का निर्णय ही नहीं ले सकी। चूंकि साधू अब तक बसपा में ही लंबे समय से रहे थे, ऐसे में उन्हें बसपा के जिला पंचायत सदस्यों का समर्थन हासिल हो गया।
इसके बाद का जिम्मा सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने संभाल लिया। नतीजा यह हुआ कि पंचायत चुनाव शुरू होने पर जिन साधू का दायरा सिर्फ जिला पंचायत सदस्य पद तक सीमित था वे अचानक तेजी से बदले एक के बाद एक घटनाक्रम के चलते जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंच गए। साधू को मिली इस सफलता की चर्चा लोग अत्यंत रोचक अंदाज में कर रहे हैं।
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