मां भवानी नाथ बाल्मीकि हुईं आप में शामिल
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‘किन्नर नया विकल्प है। उसका न कोई घर-परिवार होता है और न ही कोई औलाद, ऐसे में किसके लिए बटोरना और सहेजना। मेरे लिए राजनीति भी धर्म है। पहले धर्म क्षेत्र में जीते, अब राजनीति में भी जीतकर दिखाएंगे। अगर ऐसा हुआ तो कानूनी लड़ाई के बाद लोकसभा का चुनाव जीतने वाली थर्ड जेंडर की पहली सांसद बनेंगी, भवानी मां।’लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। आप के टिकट पर इलाहाबाद संसदीय सीट से जोर आजमाइश कर रहीं भवानी सिंह को महज 000 वोट ही मिले।
तकरीबन नब्बे फीसदी बूथ ऐसे रहे जहां उनका खाता ही नहीं खुला। इलाहाबाद दक्षिणी से तो उन्हें पहले राउंड में महज एक, दूसरे में शून्य और तीसरे में सिर्फ सात वोट ही मिल सके, जबकि यहीं इलाहाबाद दक्षिणी में ही उन्होंने अपना अस्थायी ठौर और चुनाव दफ्तर बनाया था। यहीं से रोज उनके चुनावी प्रचार की शुरुआत होती थी। वैसे भवानी का दावा है कि उनके संसदीय क्षेत्र के सभी 116 थर्ड जेंडर मतदाताओं ने उन्हें वोट दिया। परिणाम पहले से ही तकरीबन तय था, वही हुआ भी। सो आधिकारिक घोषणा से पहले ही उन्होंने दोपहर बाद दिल्ली की राह पकड़ ली।
फिर भी उनका हौसला कहीं से कम नहीं है। बोलीं, मुझे खुशी है कि मैं अपनी कैटेगरी ‘ट्रांसजेंडर’ के साथ सबसे पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ी। इलाहाबाद में ही यह भी साबित हुआ कि सभी ट्रांसजेंडर ‘सपोर्ट’ करते हैं। वहीं दूसरों के साथ ऐसा नहीं हुआ कि सभी महिलाओं ने महिलाओं और पुरुषों ने पुरुषों को ही वोट दिया हो जबकि मेेरे सभी ट्रांसजेंडर वोटर ने मुझे वोट और सपोर्ट किया।
वैसे सच यह है कि भवानी का न उनकी पार्टी ‘आप’ ने साथ दिया न ही उनके अपनों ने। उनसे पहले इलाहाबाद संसदीय सीट पर ताल ठोंकने वाली किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी सहित अन्य कोई प्रमुख महामंडलेश्वर उनके चुनाव प्रचार में नहीं शरीक हुआ। भवानी को यह भी मलाल है कि उनकी अपनी ही पार्टी ने एक किन्नर को टिकट देना आसान समझा, लेकिन साथ देना नहीं।