इलाहाबाद। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का कहना है कि कोई भी व्यक्ति अपने अतीत को त्यागकर नया जीवन शुरू कर सकता है, फिर चाहे वह सचिन दता ही क्यों न हों लेकिन सच्चिदानंद को अचानक महामंडलेश्वर बना दिया जाना लोगों को जरूर चौंकाता है। यह तो ‘आजै बनिया, काल्है सेठ’ वाली कहावत हो गई।
परंपरा के मुताबिक महामंडलेश्वर तो दूर किसी को संन्यास की दीक्षा देने से पहले भी लंबी परीक्षा होती है। संतों और समाज के बीच कड़ी परीक्षा के बाद ही दीक्षा दी जानी चाहिए, महामंडलेश्वर बनाए जाने की प्रक्रिया तो उसके बाद की है। सच्चिदानंद को भी संन्यास की दीक्षा के बाद परख के लिए अवसर दिया जाना चाहिए था। संन्यास दीक्षा से पहले कड़ी जांच परख जरूरी है। कुछ दिनों के संपर्क में ही किसी को महामंडलेश्वर बनाया जाना शंका पैदा करता है।