देश की जानी मानी महिला रंग निर्देशक उषा गांगुली का संगमनगरी की गलियों से गहरा नाता रहा है। बचपन की उनकी तो यादें यहां से जुड़ी ही हैं, उनके निर्देशन में हुए कई नाटक आज भी लोग भूले नहीं हैं। उनके अधिकांश नाटकों का केंद्र ‘स्त्री’ के इर्द-गिर्द रहा है। रंग तकनीक, शिल्प-कौशल, दृश्यपरकता, मूवमेंट्स, स्पेस ब्लॉकिंग के अनुभवों से रंगमंच के विकास को जो गति मिली, उसे हमेशा याद किया जाता रहेगा। उनके अचानक निधन से रंगकर्मी स्तब्ध रह गए हैं।
उनके निधन के बाद शुक्रवार को समयांतर केनिदेशक अनिल रंजन भौमिक ने उनसे जुड़े अनुभवों को अमर उजाला से साझा किया। भौमिक से तीन दिन पहले ही उनसे फोन से बात हुई थी। उन्होंने बताया कि उनके भाई के निधन पर संवेदना जताने के लिए जब फोन किया तो वह बहुत भावुक हो गई थीं। तब उन्होंने बंग्ला में कहा था कि -ओनील सब शेष होएगेछे। भाईई आमार रंगकोर्मिर सब काज देखतेन...। यानी अनिल सब खत्म हो गया है। भाई ही मेरे रंगकर्म के सारे काम देखते थे। करीब पांच मिनट बात हुई थी। अंत में दीदी ने कहा कि- आच्छा ओनील आज राखछी, भालो थेको..। मतलब, अच्छा अनिल आज रखती हूं। अच्छे से रहना।
भौमिक ने बताया कि तनिक भी विश्वास नहीं हो रहा है, वह अब हम सबकेबीच नहीं हैं। बताया कि उनके पिता नौकरी में रहते हुए कई वर्ष प्रयागराज में रहे। तब इलाहाबाद प्रेस क्लब के बगल में उनका फ्लैट था। भाई के साथ बचपन की बहुत सी यादें वह साझा करती रहती थीं। खासतौर से प्रयागराज में नाटकों के मंचन को लेकर भी अक्सर पूछा करती थीं। उनके कई नाटक यहां मंचित हुए, जिनमें महाभोज, रुदाली, अंतरयात्रा, हिम्मत माई, काशीनामा व अंतिम प्रस्तुति गुरु रविंद्र नाथ टैगोर कृत चंडालिका थी। रंग समीक्षक डॉ अनुपम आनंद के अनुसार एक स्त्री और अभिनेत्री के रूप में नाटक के भीतर-बाहर की यात्रा को उन्होंने सूत्रधार के रूप में जिस गति व कुशलता से प्रस्तुत किया, वह बिलकुल नया रंग अनुभव देता है। वह अक्सर कहती थीं कि अभी बहुत काम बाकी हैं। कई सपनों को पूरा करना है। उषा ने रंगकर्म को एक कला से भी ज्यादा महत्वपूर्ण सांस्कृतिक-सामाजिक क्रिया कलाप के रूप में देखा और टीवी, सिनेमा का ग्लैमर छोड़कर रंगमंच के लिए भरपूर समय दिया।वह अधिकतर नाटकों में मुख्य भूमिका के साथ ही खुद निर्देशन भी करती थीं। बैकस्टेज संस्था के निदेशक प्रवीण शेखर ने बताया कि वह कोलकाता जैसे बंगीय संस्कृति वाले महानगर में रहने के बावजूद हिंदी व हिंदी पट्टी के लोगों के बहुत निकट थीं। उनके ज्यादातर नाटक हिंदी में ही मंचित हुए हैं। साहित्य से भी उनका लगाव था। वह जब भी प्रयागराज आती थीं तो दूधनाथ सिंह और रवींद्र कालिया से जरूर मिला करती थीं।
उषा के निधन पर रंगकर्मियों ने जताया ऑनलाइन शोक
देश की प्रसिद्ध रंगकर्मी उषा गांगुली के कोलकाता के लेक गार्डन स्थित आवास पर निधन की खबर मिलने के बाद यहां रंगकर्मी स्तब्ध हैं। मयूर रंगमंच की ओर से शुक्रवार को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए वीडियो कॉलिंग के जरिए रंगकर्मियों ने ऑनलाइन श्रद्धांजलि अर्पित की।
मयूर रंगमंच की ओर से आयोजित इस शोक सभा में संस्था के अध्यक्ष शशिकांत शर्मा ने उनके प्रयागराज आगमन और प्रसिद्ध नाटक हिम्मत माई के मंचन का उल्लेख किया। सांस्कृतिक मंत्री रिभु श्रीवास्तव के अलावा विनय मिश्रा, आयुष मिश्रा, अनन्या द्विवेदी, विभु श्रीवास्तव, श्याम सुंदर शर्मा, राजीव खरे, राम गोपाल गुप्ता, अनिल कुमार श्रीवास्तव ने उनसे जुड़े अपने संस्मरणों को साझा किया। अंत में दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई।