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UP: जातियों के गणित में उलझा है यूपी की इस सीट का समीकरण... मतदाताओं के मन की थाह लेना नेताओं के लिए चुनौती

Wed, 13 Nov 2024 01:26 PM IST
शाहरुख खान राहुल शर्मा, अमर उजाला, प्रयागराज

सार

यूपी की इस सीट पर जातियों के गणित में समीकरण उलझा है। मतदाताओं के मन की थाह लेना नेताओं के लिए चुनौती है। जातीय गुणा-भाग के बीच सीधी लड़ाई सपा और भाजपा के बीच है।
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Up By Election 2024 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कर्मभूमि के नाते सुर्खियां पाने वाली फूलपुर की जनता के मूड का अनुमान लगाना तमाम सियासी पंडितों के लिए कभी आसान नहीं रहा। इस बार के उपचुनाव में भी यही स्थिति है।
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मुद्दा कोई है नहीं। जातीय गुणा-भाग के बीच सीधी लड़ाई सपा और भाजपा के बीच है। चुनाव के दरम्यान ही प्रत्याशी बदल देने से बसपा की भूमिका वोटकटवा से अधिक कुछ नहीं दिख रही। भाजपा ने पूर्व विधायक दीपक पटेल पर दांव लगाया है तो सपा ने तीन बार के विधायक रह चुके मुज्तबा सिद्दीकी जैसे अनुभवी को फिर मौका दिया है।

2022 के चुनाव में मुज्तबा को 2700 मतों से हराने वाले भाजपा के प्रवीण पटेल अब सांसद हो चुके हैं और उपचुनाव की वजह भी। 2022 से ही सपा यहां भाजपा को तगड़ी चुनौती देती आई है। 2024 लोकसभा चुनाव में सपा यहां से करीब 18 हजार मत पाने में कामयाब रही थी। इसी कारण भाजपा केंद्र-प्रदेश सरकार की उपलब्धियों का बखान करने के साथ-साथ जातिगत गोटियां भी सेट करने में पूरी ताकत झोंके हुए है।
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चार लाख से ज्यादा मतदाताओं वाली इस सीट पर 70 हजार से ज्यादा कुर्मी वोटर हैं। सवर्ण मतों के साथ जुड़ाव को साधे रखकर भाजपा फिर दीपक को विधानसभा पहुंचाने की कोशिश में है। वहीं, दूसरी बड़ी बिरादरी यादव है, जो माई (मुस्लिम-यादव) समीकरण के कारण मजबूत स्थिति में दिखती है। लोकसभा चुनाव में अन्य पिछड़ी जातियों और दलितों का भी साथ मिल जाने से भाजपा बमुश्किल 4300 मतों से जीत पाई थी।

'उपचुनाव तो सत्ता पक्ष के दबदबे का'
इंडिया गठबंधन के नेता केंद्र-प्रदेश सरकार की विफलताएं गिनाने के साथ ही पिछड़ा ,दलित, अल्पसंख्यक (पीडीए) का जातीय फार्मूला ही फिर लगा रहे हैं। हालांकि, जमनीपुर के धनंजय मिश्रा और सत्यवान पांडेय इसे खारिज करते हुए कहते हैं, उपचुनाव तो सत्ता पक्ष के दबदबे का होता है। कुछ ही लोग हैं जो मुद्दों को देखकर वोट देते हैं।

अमरेश त्रिपाठी रुद्रा और सुरेंद्र कुमार ने कहा कि लोकसभा चुनाव जैसा इस बार माहौल नहीं है। बसपा प्रत्याशी ठा. जितेंद्र कुमार सिंह के गांव कोटवा में सीएम योगी ने रविवार को जनसभा ही इसलिए की थी, ताकि भाजपा के परंपरागत सजातीय मतों का बिखराव रोका जा सके।
 

बाबा से आवारा जानवरों से निजात दिलाने की गुजारिश
कनिहार के रफीक ने कहा कि कछारी क्षेत्र में बांध का निर्माण जरूरी है। यहीं के चंद्रदेव त्रिपाठी कहते हैं कि नींवी, छवैया, दुबावल जैसे इलाके हर साल बाढ़ से लंबा नुकसान झेलते हैं। यह इस चुनाव के मुद्दे भले ही नहीं हैं, लेकिन हमारी मूक मांग बाढ़ का समाधान ही है। बाबा (सीएम योगी) से आवारा जानवरों से निजात दिलाने की गुजारिश भी है।

हनुमानगंज बाजार में धर्मेंद्र जायसवाल, मंटू केसरवानी, जीतू सोनी, चंचल द्विवेदी, रमेश आदि युवा कहते हैं कि सीएम की सभा से माहौल बदला है। इफको के निकट देवनगरी गांव के अशफाक उल्ला, शुभम, मुलायम, देवराज कहते हैं, लोकसभा चुनाव में फूलपुर विधानसभा से सपा ने बड़ी लीड हासिल की थी। उसकी पुनरावृत्ति भी हो सकती है।

मोहनगंज बाजार के दिलीप पासी सवाल उठाते हैं कि चुनाव आते ही नेता बड़े वादे कर जाते हैं, फिर कोई झांकने नहीं आता। सहसों और अंदावा के रामजी केसरवानी और दीपू जायसवाल जोर देकर कहते हैं कि बीते दस वर्ष में विकास काफी हुआ है, रिंगरोड भी बन रही है। इससे स्थानीय जाम से निजात मिल जाएगी।

गांवों तक भर्तियों में रोड़े की गूंज
पेपर लीक, पीसीएस की प्रारंभिक परीक्षा दो दिन कराने जैसे मुद्दों को लेकर उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग को घेरे हजारों प्रतियोगी छात्रों के आंदोलन की गूंज भी चुनाव में कहीं-कहीं सुनाई दे रही है। जलालपुर के विक्रम पटेल, शिवम पटेल और अनिकेत मौर्य कहते हैं, भर्तियों को लेकर सरकारी दावे कुछ भी हों, लेकिन स्थिति खराब है।
 

ध्रुवीकरण पर टिकीं भाजपा की उम्मीदें
फूलपुर 2017 और 2022 में चुनाव जीत चुकी है। पार्टी की निगाहें हैट्रिक पर है। सपा ने इस सीट से मुस्लिम प्रत्याशी को उतारा है। इस वजह से भाजपा का पूरा फोकस कुर्मी, मौर्य, दलित, कुशवाहा और सवर्ण बिरादरी के वोटरों पर है। वहीं सपा के परंपरागत वोटरों के कारण गठबंधन प्रत्याशी अपना समीकरण मजबूत मानकर चल रहे हैं। हालांकि, बसपा भी यहां छुपा रुस्तम साबित हो सकती है।

निर्णायक भूमिका में हैं ओबीसी
फूलपुर में कुल 4.07 लाख मतदाता हैं, जिनमें 2.23 लाख पुरुष और 1.83 लाख महिलाएं हैं। जातीय समीकरणों के लिहाज से ओबीसी निर्णायक भूमिका में हैं। खासकर पटेल और यादव मतदाता ही जीत-हार तय करते आए हैं। बसपा प्रत्याशी जितेंद्र कुमार सिंह नए-नवेले हैं। उनकी दुश्वारी यह भी है कि पार्टी ने शिवबरन पासी का घोषित टिकट काटकर उतारा गया है। इस कारण पासी समाज में बसपा के प्रति नाराजगी दिखने की बात भी कही जा रही है।
 

2723 वोटों के अंतर से हारे थे मुज्तबा
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रवीण पटेल ने सपा के मुज्तबा सिद्दीकी को 2723 वोटों से हराया था। भाजपा के दीपक पटेल 2012 में करछना से विधायक रह चुके हैं। उनकी मां केशरी देवी पटेल 2019 में फूलपुर से सांसद और उसके पहले 15 साल तक जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं।
 

वोटकटवा हो सकते हैं छोटे दल
चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी भी पहली बार यहां मैदान में है। इनके प्रत्याशी शाहिद अख्तर खान सपा के माई समीकरण को गड़बड़ा सकते हैं। पिछली बार हार-जीत का अंतर बेहद कम होने से कुछ दूसरे प्रत्याशी भी भाजपा और सपा की टेंशन बढ़ाए हुए हैं।
 
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वोटों का गणित
कुर्मी - 70 हजार
यादव - 65 हजार
मुस्लिम - 50 हजार
दलित - 80 हजार
ब्राह्मण - 35 हजार
ठाकुर - 20 हजार
बिंद, कुशवाहा, मौर्य - 45 हजार
अन्य - 40 हजार
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