नीरज का राजनीति में कम अनुभव बना हार का कारण
इस बार कुर्मी और ओबीसी वोटर भी बंटे हुए थे। माना जा रहा है कि बड़ी संख्या में बिंद, कुशवाहा, पटेल, मौर्य वोटरों ने उज्जवल रमण सिंह के समर्थन में मतदान किया। प्रत्याशी को सबसे बड़ी जीत करछना विधानसभा क्षेत्र में मिली और यह क्षेत्र उनका अपना घर है। इस विधानसभा क्षेत्र से उज्जवल रमण सिंह दो बार विधायक रह चुके हैं और उनके पिता रेवती रमण सिंह ने भी इसी विधानसभा क्षेत्र से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था। पिता और पुत्र दोनों का ही ग्रामीण वोटरों से गहरा और सीधा जुड़ाव रहा है, जो चुनाव परिणाम में साफ नजर आ रहा है।
वहीं, इस बार इलाहाबाद संसदीय सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे नीरज त्रिपाठी का राजनीति में अनुभव बहुत कम रहा है। इससे पहले वह कोई चुनाव भी नहीं लड़े थे। उनके पिता केसरीनाथ त्रिपाठी अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन राजनीति में उनके रसूख और शीर्ष नेताओं से रहे अच्छे संबंधों के कारण नीरज को पार्टी का भरपूर समर्थन मिला।
भाजपा प्रत्याशी को भितरघात से भी होना पड़ा दो चार
इसके बावजूद नीरज की उन ग्रामीण इलाकों तक पहुंच सीमित रही, जहां भाजपा का प्रभाव कम है। सूत्र बताते हैं कि उनका जनसंपर्क भाजपा समर्थित इलाकों में ज्यादा रहा। राजनीति में अनुभव की कमी के कारण नीरज को भितरघात से भी जूझना पड़ा। बीते कुछ माह में रेवती रमण सिंह के कुछ करीबी नेता भाजपा में शामिल हुए थे और चुनाव के दौरान उन्होंने अंदर ही अंदर कांग्रेस प्रत्याशी का समर्थन किया। इतना ही नहीं, नीरज को भी गलत फीडबैक दिया।
करछना विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के एक ब्लॉक प्रमुख ने तो कांग्रेस प्रत्याशी को चंदा तक दिया और अपने गांव में उन्हें जिताने का वादा भी किया। बूथ मैनेजमेंट और जातिगत समीकरण साधने में माहिर रेवती रमण सिंह ने अपने पुत्र की जीत के लिए चुनावी बिसात में ऐसे ही कई मोहरे चले, जो इस सीट से भाजपा प्रत्याशी के लिए शह और मात का कारण बने।
घर में भी गठबंधन भी आया काम
इलाहाबाद संसदीय सीट पर इंडिया गठबंधन तो चुनाव लड़ ही रहा था, प्रत्याशी के घर में भी सपा और कांग्रेस का गठबंधन जीत की जमीन तैयार कर रहा था। सपा में रहे उज्ज्वल रमण सिंह तो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे लेकिन उनके पिता कुंवर रेवती रमण सिंह अब भी सपा के शीर्ष नेताओं में शामिल हैं। एक तरफ उज्ज्वल के पीछे कांग्रेस कार्यकर्ता खड़े थे तो दूसरी ओर रेवती रमण सिंह के साथ सपाइयों की फौज ने भी उज्ज्वल की जीत के लिए ताकत झोंक रखी थी। नतीजा कि जिन क्षेत्रों में सपा के परंपरागत वोटर हैं, वहां रेवती रमण सिंह के संबंध काम आए और जहां कांग्रेस मजबूत थी, वहां पुराने कांग्रेसियों का समर्थन मिला।