उत्तर प्रदेश के हजारों व्यापारी पिछले नौ वर्ष से वाणिज्य कर विभाग से रिफंड की बाट जोह रहे हैं, लेकिन मुख्यालय से लेकर सरकार तक का इस ओर जरा भी ध्यान नहीं है। यह हाल तब है जब व्यापारियों ने वार्षिक रिटर्न फॉर्म दाखिल करने के दौरान इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) कैरीफॉरवर्ड करने के बजाए, फॉर्म में रिफंड का कॉलम भरा था। मजे की बात यह कि अफसरों ने व्यापारियों का डीम्ड एसेसमेंट तो कर दिया लेकिन रिफंड के मामले में चुप्पी साध गए। उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार कल्याण समिति समेत अन्य व्यापारिक संगठन व्यापारियों की करोड़ों रुपये की देनदारी के लिए वाणिज्य कर कमिश्नर से मिलने की तैयारी कर रहे हैं।
प्रदेश में वर्ष 2008 में वैट लागू होने के बाद इन व्यापारियों के टैक्स का डीम्ड एसेसमेंट हुआ। उस दौरान व्यापारियों ने वार्षिक रिटर्न फॉर्म भरे, जिसमें साल भर के कारोबार का पूरा ब्योरा दिया गया। इसमें रिफंड का भी कॉलम दिया गया था सो व्यापारियों ने आईटीसी के बजाए, फॉर्म में रिफंड का कालम भरा, ताकि उन्हें विभाग पर बढ़ रही रकम वापस मिल सके। प्रदेश में ऐसे व्यापारियों की संख्या तकरीबन 20 हजार और अकेले इलाहाबाद में पांच से छह हजार के बीच है। सवाल यह है कि जब व्यापारी ने वार्षिक रिटर्न फॉर्म में रिफंड मांगा और अफसरों ने डीम्ड एसेसमेंट कर फाइल निस्तारित कर दी तो रिफंड क्यों नहीं किया गया? जबकि 90 दिन में रिफंड न होने पर 12 प्रतिशत की दर से ब्याज का भी प्रावधान है। दूसरे यह भी कि जब रिफंड नहीं करना था तो रिटर्न फॉर्म में इसका कॉलम क्यों दिया गया।
विभाग के अफसर इस बारे में खुल कर कुछ बोलने के बजाए कह रहे हैं कि मुख्यालय से इस संबंध में कोई आदेश नहीं है। डीम्ड ऐसेसमेंट के दौरान अफसरों ने रिटर्न फॉर्म का परीक्षण अवश्य किया होगा। ऐसे में उसके रिफंड के कॉलम पर भी उनकी नजर गई होगी, ऐसे में रिफंड के लिए मुख्यालय से आदेश न मिलने का बहाना कर देना समझ से परे हैं। ऐसा इसलिए भी कि जब रिफंड नहीं करता था तो फॉर्म में उसके लिए कॉलम को दिया गया। समिति के संयोजक संतोष पनामा का कहना है कि सब का साथ विकास विकास का नारा देने वाले मुख्यमंत्री व्यापारियों के हित को लेकर जरा भी गंभीर नहीं है। बीते नौ साल से व्यापारियों का करोड़ों रुपये बकाया और वह नियम के तहत रिफंड मांग रहे हैं। उनका कहना है कि इस मामले में जल्द कमिश्नर से गुहार लगाई जाएगी।