मुसमानों के पसंदीदा नेता थे बहुगुणा
चाहे नवाब हों या आम मुसलमान, सभी उनके मुरीद रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू के बाद यूपी का मुसलमान किसी को अपना नेता समझता था तो वह हेमवती नंदन बहुगुणा थे। मुजप्फरनगर से लेकर गोरखपुर तक मुसलमानों के अकेले नेता थे। उनको उर्दू बोलने का शौक था और अक्सर अपने भाषणों में शेरो-शायरी किया करते थे, जिसे मुसलमान बेहद पसंद करते थे।
हालांकि, उनके आलोचक कहा करते थे कि वह अपने उर्दू भाषण देवनागरी में लिखवा कर उन्हें रट लिया करते थे। आजकल के राजनीतिक इफ्तारों से कहीं पहले बहुगुणा ने इफ्तार पार्टियां देनी शुरू कर दी थीं। कई बार किसी पब्लिक मीटिंग के दौरान अजान की आवाज सुनाई देने पर वह बोलना बंद कर देते थे। ईद के दिन उन्हें ईदगाह के बाहर मुसलमानों से गले मिलते देखा जाता था। ये चीज़ें उन्हें मुसलमानों से जोड़ती थी, लेकिन उनके आलोचक इसे ''स्टंट'' की संज्ञा देते थे। इन सबको लेकर माना जा रहा था कि अमिताभ बच्चन के आने के बाद भी बहुत असर नहीं पड़ेगा।
तेलुगुदेशम पार्टी से चुनाव लड़ने का था ऑफर
मुसलमान बहुगुणा को वोट करेंगे। उस चुनाव की कवरेज करने वाले पत्रकार स्नेह मधुर बताते हैं कि बाद में तेजी से प्रचारित होने लगा कि बहुगुणा अमिताभ बच्चन के मुकाबले चुनाव हार सकते हैं। यह बात ऊपर तक पहुंचने लगी और उनके करीबी कई नेता इसे लेकर मंथन करने लगे थे। स्नेह मधुर बताते हैं कि बहुगुणा के आवास पर बैठक हो रही थी। पत्रकारों का जमावड़ा लगा था। उसी समय फोन की घंटी बजने लगी।
बहुगुणा की को कुछ लोगों ने फोन सुन लेने की सलाह दी। वह उठकर अपने कक्ष में गए और कुछ देर बाद खमोशी ओढ़े लौटे। उनसे जब पूछा जाने लगा कि किसका फोन था और बात क्या हुई? तब उनका कहना था कि एनटी रामाराम ने फोन पर संदेश दिया है कि हैदराबाद आ जाओ, वहां से भी नामांकन कर दो। तेलुगुदेशम के समर्थन से जीत जाओगे। लेकिन, एनटी रामाराव की बात धरी रह गई। बहुगुणा हैदराबाद से लड़ने नहीं गए और अंतत: उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।