दिल और कला की कोई सरहद नहीं होती। आज हम शोर के आदी हो गए हैं, अपने और दूसरों के दिल की आवाज ही नहीं सुन पा रहे हैं। ये बातें फिल्म निर्देशक मुजफ्फर अली ने पाकिस्तानी कलाकारों के विरोध और फिल्मों के संगीत में हो रहे बदलाव पर कहीं। वह रविवार को एक कार्यक्रम में शामिल होने इलाहाबाद आए थे।
उन्होंने कहा कि फिल्म एक माहौल में बनती है, वैसा माहौल आज नहीं है। आज प्रोडक्शन वैल्यू, पब्लिसिटी और कलाकार बहुत महंगे हो गए हैं। फिल्मों में तकनीक का बहुत ज्यादा इस्तेमाल है। यही वजह है कि उमरावजान जैसी फिल्म दोबारा नहीं बन सकी। हमने तो फिल्म बहुत सस्ते में बना ली थी। मुजफ्फर अली ने कहा कि फिल्मों में गीतों का प्रयोग कम हो गया है। पब्लिक का टेस्ट गिर गया है। गांवों में भी कोई सभ्यता नहीं बची है। वहां भी डिस्को हावी है। कांवड़ियों की यात्रा में भी जो गीत बजते हैं वो हमारी सभ्यता का हिस्सा नहीं हैं। जब तक शोर के पीछे भागते रहेंगे तब तक दूसरों के दिलों की आवाज नहीं सुन पाएंगे।