जेल में रहने के चलते किया गया निलंबित
याची के अधिवक्ता विमल चंद्र मिश्रा ने दलील दी कि प्रतिवादियों ने याची को जेल में हिरासत के कारण निलंबित किया। साथ ही आपराधिक मामले से बरी होने के बाद उसका निलंबन आदेश रद्द कर सेवा भी बहाल कर दी। इस दौरान उसके खिलाफ न तो अनुशासनात्मक जांच और न ही विभागीय कार्यवाही हुई। याची निलंबन अवधि के नियमित वेतन का भुगतान पाने का अधिकारी है। जबकि, राज्य सरकार की ओर से स्थायी अधिवक्ता का कहना था कि याची भले ही बरी कर दिया गया है, लेकिन वह बाइज्जत बरी नहीं है। इसलिए वह निलंबन अवधि के नियमित वेतन भुगतान का हकदार नहीं है।
कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि मौजूदा मामले में याची को बिना जांच के सिर्फ जेल में रहने के कारण निलंबित कर दिया गया और आपराधिक मामले से बरी होने के बाद निलंबन तुरंत रद्द भी कर दिया गया। दोषमुक्ति के फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं की गई । इसलिए इस मामले में ''''काम नहीं तो वेतन नहीं'''' का सिद्धांत लागू किया जाना अनुचित है।
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अगर याची को आपराधिक मामले में जमानत मिली होती और उसे केवल निलंबित रखा गया होता तो ''''काम नहीं तो वेतन नहीं''''का सिद्धांत लागू हो सकता था। इस मामले में याची जेल जाने से लेकर बरी होने तक न्यायिक हिरासत में ही रहा। इसलिए याची की ओर से यह प्रमाण पत्र देने का कोई सवाल भी नहीं उठता कि वह निलंबन अवधि में कहीं भी लाभकारी रूप से कार्यरत था या नहीं।