गांवों में शरारती बच्चों को अब बाघ और भेड़िये के नाम पर डराया नहीं जाता। जंगलों में भी अब ये ढूंढ़े नहीं मिलते। काले हिरन, गैंडा, डॉलफिन जैसे वन्य जीव भी लुप्त होने की कगार पर हैं। वन विभाग के आंकड़े गवाह हैं कि इनकी संख्या लगातार कम हो रही है। इन्हें संरक्षित करने के लिए बनाए गए अभयारण्य, पार्क भी नाकाफी साबित हो रहे हैं। बढ़ती आबादी, कटते जंगल, शिकारी और तस्कर इनकी जान के दुश्मन बन गए हैं। अगर यही हालत रही तो आने वाले समय में चिड़या घरों पर भी ताला लग जाएगा और बच्चे सिर्फ इनकी कहानियां सुना करेंगे।
तीन दिन पहले ही थाईलैंड में एक ताजा मामला सामने आया है, जहां एक साथ 40 शावकों के शव पाए गए। वन्य जीव प्रेमियों के लिए यह घटना रोंगटे खड़े कर देने वाली है। देश में भी हालात अच्छे नहीं हैं। वन्य जीव खतरे में हैं। यूपी की ही बात करें तो वन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में बाघों की संख्या तेजी से घटी है। वर्तमान में बाघों की संख्या घटकर तीन दर्जन के आसपास रह गई है। इसी तरह हाथियों की संख्या भी तेजी से घट रही है। प्रदेश में हाथियों की संख्या 100 के आसपास रह गई है। दूसरे वन्य जीवों की भी यही स्थिति है। मुख्य वन संरक्षक दक्षिणी क्षेत्र जीएन कृष्णमूर्ति दावा का दवा है कि पिछले कुछ वर्षों से वन्य जीवों के संरक्षण के लिए प्रयास तेज किए गए हैं। दुधवा नेशनल पार्क के साथ चंबल वन्यजीव विहार, मिर्जापुर स्थित कतर्नियाघाट अभयारण्य, बांदा में रानीपुर वन्यजीव विहार, ललितपुर में महावीर स्वामी अभयारण्य, लखीमपुर खीरी में किशनपुर वन्यजीव, मिर्जापुर में कैमूर वन्यजीव, महराजगंज में सोहागीबरवा अभयारण्य में ऐसे जीव संरक्षित किए जा रहे हैं।
हालांकि वन विभाग के अफसरों के दावे वन्य जीव प्रेमियों के गले नहीं उतरते। पर्यटकों की मानें तो सिर्फ दुधवा नेशनल पार्क में ही बाघ, गैंडा, हाथी, घड़ियाल जैसे वन्य जीव दिखाई पड़ते हैं। बाकी अभयारण्य सिर्फ नाम के हैं। शेर तो सिर्फ गुजरात में पाए जाते हैं, सो गुजरात सरकार की मदद से यूपी सरकार इटावा में 1000 एकड़ जमीन में शेर सफारी विकसित कर रहा है। देखना है कि बाघों और दूसरे वन्य जीवों के संरक्षण में अब तक विफल रही प्रदेश सरकार यूपी में शेरों के लिए क्या कर पाती है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. कृष्ण कुमार कहते हैं कि यूपी में पाए जाने वाली वन्य जाति प्रजातियां जैसे हाथी, भालू, बंदर, लंगूर, लोमड़ी, सियार, खरगोश, लकड़बग्घा, भेड़िया जैसे वन्य जीव हाशिए पर पहुंच गए हैं। जो बचे हैं, वे जंगलों के धीरे-धीरे समाप्त होने के कारण आबादी क्षेत्र की ओर से पलायन कर रहे हैं और इससे उनकी जान पर संकट बना हुआ है। प्रो. कृष्ण कुमार कहते हैं कि अगर लोग सचेत नहीं हुए तो इन वन्य जीवों को भी बच्चे डायनासोर की तरह किताबों में ही पढ़ा करेंगे।
गंगा में डॉलफिन का पाया जाना प्रदूषण कम होने का प्रमाण माना जाता है लेकिन कुछ वर्षों से गंगा में लगातार गंदगी बढ़ने से इनकी संख्या में कमी आ आई है जिसके चलते अब इनकी गणना कराई जा रही है। संस्था डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और प्रदेश सरकार के वन विभाग के संयुक्त अभियान में पिछले वर्ष हुए सर्वे में गंगा में डॉलफिन की कुल संख्या 1270 आंकी गई है। इनमें इलाहाबाद क्षेत्र में गंगा में मिली डॉलफिन भी शामिल हैं। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया के डायरेक्टर (रिवर) सुरेश बाबू ने बताया कि यह गणना पिछले वर्ष अक्तूबर में की गई थी। हालांकि इस समय गंगा का जलस्तर काफी कम हो जाने के कारण इनकी तेजी से घटी है।
वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में वन क्षेत्र का एरिया मात्र सात फीसदी रह गया है जबकि समतली एरिया में यह आंकड़ा 33 फीसदी के पास होना चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक वन्य जीवों के कम होने का मुख्य कारण यह भी है। वन विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश का कुल एरिया 240928 वर्ग किमी है। उसमें वनों का हिस्सा मात्र 16567 वर्ग किमी है। ग्रामीण क्षेत्रों में लगे पेड़ों की संख्या मिलाकर यह आंकड़ा कुल नौ फीसदी के करीब पहुंच रहा है।